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Thursday, 15 September 2016

तुम हंसती हो तो

तुम
हंसती हो तो
बिखर जाते हैं
टोकरा भर रजनीगंधा
जिन्हें बटोर कर
रख लेता हूँ सिरहाने
और फिर,
महकते हैं ख्वाब
मुस्कुराती है रात

मुकेश इलाहाबादी --