तुम और तुम्हारा ये डस्की रंग
तुम्हें देखता हूँ
तो लगता है
जैसे शाम ने
अपनी सारी नरमी
तुम्हारी त्वचा में रख दी हो।
तुम और तुम्हारा ये डस्की रंग—
न धूप की तरह तेज़,
न रात की तरह गहरा,
बस एक सुकून भरी
शाम जैसा।
जब तुम पास होती हो
तो लगता है
हवा भी
थोड़ी गरम और मुलायम हो गई है।
कभी-कभी सोचता हूँ
रंगों की दुनिया में
परवरदिगार ने
सबसे ख़ूबसूरत फैसला
शायद तुम्हें बनाते वक़्त ही किया था
तुम
और तुम्हारा
ये डस्की रंग।
मुकेश ,,,,,,,
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