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Wednesday, 18 March 2026

रूह की पगडंडी पर चलते हुए साये

 रूह की पगडंडी पर चलते हुए साये


रूह की पगडंडी पर

चलते हुए साये

कभी मेरे होते हैं,

कभी तुम्हारे।


धूप जब थककर

किसी याद के पेड़ तले बैठती है,

तब ये साये

लंबे होकर

बीते हुए वक़्त की तरह फैल जाते हैं।


मैं उन्हें छूना चाहता हूँ

पर वे हर बार

एक अधूरी कहानी बनकर

हथेलियों से फिसल जाते हैं।


तुम्हारी आहट

अब भी कहीं पास ही है,

जैसे किसी अनकहे शब्द की

धीमी-सी कंपन

हवा में ठहरी हो।


और मैं

रूह की उसी पगडंडी पर

धीरे-धीरे चलता हुआ

हर साये में

तुम्हें पहचानने की कोशिश करता हूँ।


शायद

ये साये ही सच हैं,

और हम

बस उन सायों के पीछे

चलती हुई

एक खामोश तलाश।


मुकेश ,,,,

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