शामें अब
मुझे बुझती हुई अगरबत्ती जैसी लगती हैं
धीरे-धीरे कम होती हुई,
मगर आख़िरी क्षण तक
अपनी गंध बचाए हुए।
हम सब भी शायद
ऐसे ही होते हैं।
देह पहले थकती है,
फिर इच्छाएँ,
और सबसे अंत में
आदमी की कोई अदृश्य महक बची रहती है
जो उसके जाने के बाद भी
कमरों में घूमती रहती है।
कभी ध्यान दिया है —
पुराने घरों में
घड़ियाँ हमेशा थोड़ी धीमी चलती हैं।
जैसे दीवारें
वक़्त को जल्दी जाने नहीं देना चाहतीं।
मैं जब बचपन के किसी कमरे को याद करता हूँ,
तो चेहरों से पहले
वहाँ की रोशनी याद आती है।
दोपहर का एक टुकड़ा,
खिड़की पर रखी स्टील की कटोरी,
और दूर कहीं
रेडियो पर बजता कोई भूला हुआ गीत।
शायद स्मृति
घटनाओं को नहीं बचाती,
वह बस
उन पर गिरती हुई रोशनी बचा लेती है।
अब मुझे लोगों की बातों से ज़्यादा
उनकी थकान दिखाई देती है।
हर आदमी
अपने भीतर कोई भारी फ़र्नीचर उठाए घूम रहा है
कोई अपराधबोध,
कोई अधूरा प्रेम,
कोई ऐसा वाक्य
जो वह बरसों पहले कह नहीं पाया।
और रात होते-होते
वे सब चीज़ें
उसकी आत्मा के कमरे में
धीरे-धीरे रख दी जाती हैं।
फिर आदमी सो जाता है
इस भ्रम में
कि वह अकेला है।
मुकेश ,,,,,,,
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