धूप की दरिया से गुफ़्तगू
दोपहर का वक़्त था।
धूप आज
ज़मीन पर नहीं ठहरी थी,
वह बह रही थी
एक सुनहरी दरिया की तरह।
पेड़ों की शाखों से उतरती,
पत्थरों पर चमकती,
और पानी की सतह पर
अपने ही टुकड़े बिखेरती हुई।
मैं किनारे बैठा था।
पाँव आधे रेत में,
आधे ख़यालों में।
तभी दरिया ने पूछा
“तुम लोग
हमेशा बहने से इतना डरते क्यों हो?”
मैंने पानी में
अपना काँपता हुआ अक्स देखा
और कहा
“क्योंकि बह जाने में
खो जाने का डर होता है।”
दरिया हँसी।
उसकी हँसी में
छोटे-छोटे पत्थरों से टकराते पानी की आवाज़ थी।
वह बोली
“खोता वही है
जो ख़ुद को चीज़ समझता है।
जो सफ़र बन जाए,
उसे कौन खो सकता है?”
धूप
उसकी लहरों पर झुकी हुई थी।
ऐसा लगता था
जैसे रौशनी पानी को नहीं,
उसकी तन्हाई को सहला रही हो।
मैंने पूछा
“और ठहराव?”
दरिया कुछ देर
बहती रही चुपचाप।
फिर बोली
“ठहराव सुंदर है,
मगर सिर्फ़ पेड़ों के लिए।
पानी अगर रुक जाए,
तो अपने ही चेहरे से डरने लगता है।”
उसकी बात सुनकर
मुझे अपने भीतर
कई रुके हुए मौसम याद आए।
कुछ अधूरी बातें,
कुछ पुराने दुख,
कुछ नाम
जो बरसों से
दिल के बंद घाट पर पड़े थे।
धूप ने
पानी में चमकते हुए कहा
“देखो,
दरिया हर चीज़ को साथ लेकर चलता है —
पत्ते, मिट्टी, टूटी टहनियाँ,
यहाँ तक कि डूबे हुए आसमान भी।
फिर भी
उसका पानी मैला नहीं होता।
क्योंकि उसने
पकड़कर रखना नहीं सीखा।”
शाम होने लगी थी।
धूप धीरे-धीरे
दरिया की सतह से उतर रही थी।
जाते-जाते
दरिया ने मुझसे कहा
“एक दिन
तुम्हें भी समझ आ जाएगा —
ज़िंदगी किनारा नहीं,
बहाव माँगती है।”
मुकेश ,,,,,,,
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