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Sunday, 24 May 2026

प्रश्नोपनिषद् — प्रथम प्रश्न — पञ्चदश मंत्र गृहस्थधर्म, ब्रह्मचर्य और सत्य का उपनिषदिक विवेचन

 प्रश्नोपनिषद् प्रथम प्रश्न पञ्चदश मंत्र

गृहस्थधर्म, ब्रह्मचर्य और सत्य का उपनिषदिक विवेचन

मंत्र का मूल संस्कृत पाठ

तद् ये वै तत् प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते ।तेषामेवैष ब्रह्मलोकोयेषां तपो ब्रह्मचर्यंयेषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥१५॥

 

मंत्र का हिन्दी अनुवाद

जो लोग प्रजापति-व्रत का पालन करते हैं, वे संतति उत्पन्न करते हैं।  किन्तु उन्हीं के लिए वह ब्रह्मलोक है जिनका जीवन तपमय है, जिनमें ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठित है, और जिनमें सत्य स्थिर है। 

 

भावार्थ

यह मंत्र गृहस्थधर्म को केवल जैविक या सामाजिक संस्था मानकर आध्यात्मिक अनुशासन के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

उपनिषद् स्पष्ट करता है कि केवल संतति उत्पन्न करना पर्याप्त नहीं, तप, संयम, सत्य इनसे युक्त जीवन ही ब्रह्मलोक का अधिकारी बनता है।

 

अन्वय

ये वै तत् प्रजापतिव्रतं चरन्ति, ते मिथुनम् उत्पादयन्ति।
तेषाम् एव एषः ब्रह्मलोकः, येषाम् तपः, ब्रह्मचर्यम्, सत्यं प्रतिष्ठितम्।

 

संधि-विच्छेद

संधियुक्त पद

विच्छेद

संधि प्रकार

तद्ये

तत् + ये

व्यंजन संधि

हवै

+ वै

निपात

प्रजापतिव्रतम्

प्रजापतेः + व्रतम्

षष्ठी तत्पुरुष

मिथुनमुत्पादयन्ते

मिथुनम् + उत्पादयन्ते

व्यंजन संधि

तेषामेवैष

तेषाम् + एव + एषः

स्वर संधि

ब्रह्मलोको

ब्रह्म + लोकः

समास

येषु सत्यं

येषु + सत्यं

पदसंबन्ध


शब्दार्थ एवं व्याकरणिक विश्लेषण

. प्रजापतिव्रतम् : प्रजापति से सम्बन्धित व्रत। यहाँ गृहस्थधर्म और सन्तानोत्पत्ति का धर्मसम्मत विधान। 

. मिथुनम् : स्त्री-पुरुष संयोग। सृष्टि की निरन्तरता का साधन। 

. ब्रह्मलोकः ब्रह्मविद्या से सम्बद्ध उच्च लोक। अद्वैत दृष्टि में ब्रह्मप्राप्ति की अवस्था। 

. तपः आत्मसंयम, इन्द्रियनिग्रह,आन्तरिक अनुशासन। 

. ब्रह्मचर्यम् : यहाँ व्यापक अर्थ संयमित जीवन, धर्मानुकूल आचरण, चेतन ऊर्जा का संरक्षण। 

. सत्यं प्रतिष्ठितम् : जिनमें सत्य स्थिर हो गया है। सत्य केवल वाणी नहीं; अस्तित्वगत प्रामाणिकता। 

 

आदि शंकराचार्य भाष्य (संशोधित एवं शुद्ध रूप)

तत्र एवं सति ये गृहस्थाः वैइति प्रसिद्धस्मरणार्थो निपातः। तत् प्रजापतेः व्रतं ऋतौ भार्यागमनं चरन्ति कुर्वन्ति, तेषाम् एतत् फलम्। किम्? ते मिथुने पुत्रं दुहितरं उत्पादयन्ति। इदं फलम् इष्टापूर्तादिकर्मकारिणाम्। तेषाम् एव एषः यथोक्तः चान्द्रमसः ब्रह्मलोकः पितृयाणलक्षणः। येषां तपः स्नातकव्रतादीनि, ब्रह्मचर्यं , ऋतावन्यत्र मिथुनासमाचरणम्। येषु सत्यं अनृतवर्जनेन प्रतिष्ठितम्, अन्यथा आचारतया वर्तते नित्यम्॥

 

शंकरभाष्य का हिन्दी अनुवाद

शंकराचार्य कहते हैं

जो गृहस्थ प्रजापति-व्रत का पालन करते हैं अर्थात् ऋतुकाल में धर्मानुसार पत्नीगमन करते हैं वे पुत्र और पुत्री की उत्पत्ति करते हैं।

यह इष्टापूर्त आदि कर्म करने वाले गृहस्थों का फल है।ऐसे लोगों को चान्द्रमस ब्रह्मलोक अर्थात् पितृयान की प्राप्ति होती है।

किन्तु यह तभी सम्भव है जब उनमें तप, ब्रह्मचर्य, तथा सत्य ,प्रतिष्ठित हों।

यहाँ ब्रह्मचर्य का अर्थ है ऋतुकाल के अतिरिक्त मैथुन का त्याग।

और सत्य का अर्थ है अनृत का परित्याग कर सत्याचरण में स्थित रहना।

 

 

दार्शनिक विवेचन

. गृहस्थाश्रम की उपनिषदिक प्रतिष्ठा : यह मंत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ गृहस्थाश्रम को आध्यात्मिक मार्ग के रूप में स्वीकार किया गया है।

. “प्रजापतिव्रत” : सन्तानोत्पत्ति को केवल जैविक क्रिया नहीं माना गया। वह धर्म,उत्तरदायित्व,और सृष्टि-क्रम की निरन्तरता है।

. ब्रह्मचर्य की पुनर्व्याख्या :  शंकराचार्य का दृष्टिकोण अत्यन्त संतुलित है।वे गृहस्थ को भी ब्रह्मचारी मानते हैं यदि वह संयमित, ऋतुसंमत, धर्मानुकूल जीवन जीता हो।

. सत्य की सर्वोच्चता : उपनिषद् में सत्य केवल नैतिक गुण नहीं। वह ब्रह्म का स्वरूप है।

. तप का अर्थ : तप केवल कठिन तपस्या नहीं। वह आत्मानुशासन, संयम,सजगता है।

. ब्रह्मलोक की अवधारणा : यहाँ ब्रह्मलोककर्मप्रधान गृहस्थ के लिए उच्च लोक का प्रतीक है।

अद्वैत वेदान्त में इसका अंतिम अर्थ ब्रह्मप्राप्ति है।

 

अन्य उपनिषदों एवं ग्रन्थों से साम्य

तैत्तिरीय उपनिषद् : सत्यं वद धर्मं चर।

छान्दोग्य उपनिषद् : गृहस्थाश्रम को यज्ञात्मक जीवन कहा गया।

भगवद्गीता :  “युक्ताहारविहारस्य…”संयमित जीवन को योग का आधार बताया गया।

 

शोधपूर्ण निबंध

गृहस्थाश्रम और ब्रह्मचर्य : प्रश्नोपनिषद् की संतुलित दृष्टि

प्रश्नोपनिषद् का पञ्चदश मंत्र भारतीय जीवनदर्शन की उस गहन संतुलित परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें आध्यात्मिकता और सामाजिक जीवन परस्पर विरोधी नहीं हैं।

भारतीय परम्परा ने चार आश्रमों की व्यवस्था दी ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास। 

इनमें गृहस्थाश्रम को आधार कहा गया क्योंकि वही सम्पूर्ण सामाजिक संरचना का पोषक है।

किन्तु उपनिषद् गृहस्थजीवन को केवल भोगमय जीवन नहीं बनने देता। वह उसे तप, सत्य और संयम से जोड़ता है।

शंकराचार्य विशेष रूप से ऋतावन्यत्र मिथुनासमाचरणम्कहकर यह स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्मचर्य का अर्थ पूर्ण दमन नहीं, बल्कि सजग संयम है।

यह दृष्टि आधुनिक मनोविज्ञान की भी स्मृति कराती है, जहाँ दमन की अपेक्षा संतुलित ऊर्जा-प्रबंधन को महत्त्व दिया जाता है।

 

प्रश्नोपनिषद् का पञ्चदश मंत्र गृहस्थजीवन को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान करता है।

यह मंत्र सिखाता है कि

· संयमित गृहस्थ भी ब्रह्ममार्ग का अधिकारी है,

· सत्य और तप के बिना जीवन अधूरा है,

· तथा वास्तविक ब्रह्मचर्य चेतन अनुशासन है। 

इस प्रकार यह मंत्र भारतीय आश्रमव्यवस्था, नैतिकता और वेदान्त तीनों का अत्यन्त सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है।

प्रश्नोपनिषद् प्रथम प्रश्न पञ्चदश मंत्र

गृहस्थधर्म, ब्रह्मचर्य और सत्य का उपनिषदिक विवेचन

मंत्र का मूल संस्कृत पाठ

तद् ये वै तत् प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते ।तेषामेवैष ब्रह्मलोकोयेषां तपो ब्रह्मचर्यंयेषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥१५॥

 

मंत्र का हिन्दी अनुवाद

जो लोग प्रजापति-व्रत का पालन करते हैं, वे संतति उत्पन्न करते हैं।  किन्तु उन्हीं के लिए वह ब्रह्मलोक है जिनका जीवन तपमय है, जिनमें ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठित है, और जिनमें सत्य स्थिर है। 

 

भावार्थ

यह मंत्र गृहस्थधर्म को केवल जैविक या सामाजिक संस्था मानकर आध्यात्मिक अनुशासन के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

उपनिषद् स्पष्ट करता है कि केवल संतति उत्पन्न करना पर्याप्त नहीं, तप, संयम, सत्य इनसे युक्त जीवन ही ब्रह्मलोक का अधिकारी बनता है।

 

अन्वय

ये वै तत् प्रजापतिव्रतं चरन्ति, ते मिथुनम् उत्पादयन्ति।
तेषाम् एव एषः ब्रह्मलोकः, येषाम् तपः, ब्रह्मचर्यम्, सत्यं प्रतिष्ठितम्।

 

संधि-विच्छेद

संधियुक्त पद

विच्छेद

संधि प्रकार

तद्ये

तत् + ये

व्यंजन संधि

हवै

+ वै

निपात

प्रजापतिव्रतम्

प्रजापतेः + व्रतम्

षष्ठी तत्पुरुष

मिथुनमुत्पादयन्ते

मिथुनम् + उत्पादयन्ते

व्यंजन संधि

तेषामेवैष

तेषाम् + एव + एषः

स्वर संधि

ब्रह्मलोको

ब्रह्म + लोकः

समास

येषु सत्यं

येषु + सत्यं

पदसंबन्ध


शब्दार्थ एवं व्याकरणिक विश्लेषण

. प्रजापतिव्रतम् : प्रजापति से सम्बन्धित व्रत। यहाँ गृहस्थधर्म और सन्तानोत्पत्ति का धर्मसम्मत विधान। 

. मिथुनम् : स्त्री-पुरुष संयोग। सृष्टि की निरन्तरता का साधन। 

. ब्रह्मलोकः ब्रह्मविद्या से सम्बद्ध उच्च लोक। अद्वैत दृष्टि में ब्रह्मप्राप्ति की अवस्था। 

. तपः आत्मसंयम, इन्द्रियनिग्रह,आन्तरिक अनुशासन। 

. ब्रह्मचर्यम् : यहाँ व्यापक अर्थ संयमित जीवन, धर्मानुकूल आचरण, चेतन ऊर्जा का संरक्षण। 

. सत्यं प्रतिष्ठितम् : जिनमें सत्य स्थिर हो गया है। सत्य केवल वाणी नहीं; अस्तित्वगत प्रामाणिकता। 

 

आदि शंकराचार्य भाष्य (संशोधित एवं शुद्ध रूप)

तत्र एवं सति ये गृहस्थाः वैइति प्रसिद्धस्मरणार्थो निपातः। तत् प्रजापतेः व्रतं ऋतौ भार्यागमनं चरन्ति कुर्वन्ति, तेषाम् एतत् फलम्। किम्? ते मिथुने पुत्रं दुहितरं उत्पादयन्ति। इदं फलम् इष्टापूर्तादिकर्मकारिणाम्। तेषाम् एव एषः यथोक्तः चान्द्रमसः ब्रह्मलोकः पितृयाणलक्षणः। येषां तपः स्नातकव्रतादीनि, ब्रह्मचर्यं , ऋतावन्यत्र मिथुनासमाचरणम्। येषु सत्यं अनृतवर्जनेन प्रतिष्ठितम्, अन्यथा आचारतया वर्तते नित्यम्॥

 

शंकरभाष्य का हिन्दी अनुवाद

शंकराचार्य कहते हैं

जो गृहस्थ प्रजापति-व्रत का पालन करते हैं अर्थात् ऋतुकाल में धर्मानुसार पत्नीगमन करते हैं वे पुत्र और पुत्री की उत्पत्ति करते हैं।

यह इष्टापूर्त आदि कर्म करने वाले गृहस्थों का फल है।ऐसे लोगों को चान्द्रमस ब्रह्मलोक अर्थात् पितृयान की प्राप्ति होती है।

किन्तु यह तभी सम्भव है जब उनमें तप, ब्रह्मचर्य, तथा सत्य ,प्रतिष्ठित हों।

यहाँ ब्रह्मचर्य का अर्थ है ऋतुकाल के अतिरिक्त मैथुन का त्याग।

और सत्य का अर्थ है अनृत का परित्याग कर सत्याचरण में स्थित रहना।

 

 

दार्शनिक विवेचन

. गृहस्थाश्रम की उपनिषदिक प्रतिष्ठा : यह मंत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ गृहस्थाश्रम को आध्यात्मिक मार्ग के रूप में स्वीकार किया गया है।

. “प्रजापतिव्रत” : सन्तानोत्पत्ति को केवल जैविक क्रिया नहीं माना गया। वह धर्म,उत्तरदायित्व,और सृष्टि-क्रम की निरन्तरता है।

. ब्रह्मचर्य की पुनर्व्याख्या :  शंकराचार्य का दृष्टिकोण अत्यन्त संतुलित है।वे गृहस्थ को भी ब्रह्मचारी मानते हैं यदि वह संयमित, ऋतुसंमत, धर्मानुकूल जीवन जीता हो।

. सत्य की सर्वोच्चता : उपनिषद् में सत्य केवल नैतिक गुण नहीं। वह ब्रह्म का स्वरूप है।

. तप का अर्थ : तप केवल कठिन तपस्या नहीं। वह आत्मानुशासन, संयम,सजगता है।

. ब्रह्मलोक की अवधारणा : यहाँ ब्रह्मलोककर्मप्रधान गृहस्थ के लिए उच्च लोक का प्रतीक है।

अद्वैत वेदान्त में इसका अंतिम अर्थ ब्रह्मप्राप्ति है।

 

अन्य उपनिषदों एवं ग्रन्थों से साम्य

तैत्तिरीय उपनिषद् : सत्यं वद धर्मं चर।

छान्दोग्य उपनिषद् : गृहस्थाश्रम को यज्ञात्मक जीवन कहा गया।

भगवद्गीता :  “युक्ताहारविहारस्य…”संयमित जीवन को योग का आधार बताया गया।

 

शोधपूर्ण निबंध

गृहस्थाश्रम और ब्रह्मचर्य : प्रश्नोपनिषद् की संतुलित दृष्टि

प्रश्नोपनिषद् का पञ्चदश मंत्र भारतीय जीवनदर्शन की उस गहन संतुलित परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें आध्यात्मिकता और सामाजिक जीवन परस्पर विरोधी नहीं हैं।

भारतीय परम्परा ने चार आश्रमों की व्यवस्था दी ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास। 

इनमें गृहस्थाश्रम को आधार कहा गया क्योंकि वही सम्पूर्ण सामाजिक संरचना का पोषक है।

किन्तु उपनिषद् गृहस्थजीवन को केवल भोगमय जीवन नहीं बनने देता। वह उसे तप, सत्य और संयम से जोड़ता है।

शंकराचार्य विशेष रूप से ऋतावन्यत्र मिथुनासमाचरणम्कहकर यह स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्मचर्य का अर्थ पूर्ण दमन नहीं, बल्कि सजग संयम है।

यह दृष्टि आधुनिक मनोविज्ञान की भी स्मृति कराती है, जहाँ दमन की अपेक्षा संतुलित ऊर्जा-प्रबंधन को महत्त्व दिया जाता है।

 

प्रश्नोपनिषद् का पञ्चदश मंत्र गृहस्थजीवन को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान करता है।

यह मंत्र सिखाता है कि

· संयमित गृहस्थ भी ब्रह्ममार्ग का अधिकारी है,

· सत्य और तप के बिना जीवन अधूरा है,

· तथा वास्तविक ब्रह्मचर्य चेतन अनुशासन है। 

इस प्रकार यह मंत्र भारतीय आश्रमव्यवस्था, नैतिकता और वेदान्त तीनों का अत्यन्त सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है।

  प्रश्नोपनिषद् प्रथम प्रश्न पञ्चदश मंत्र

गृहस्थधर्म, ब्रह्मचर्य और सत्य का उपनिषदिक विवेचन

मंत्र का मूल संस्कृत पाठ

तद् ये वै तत् प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते ।तेषामेवैष ब्रह्मलोकोयेषां तपो ब्रह्मचर्यंयेषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥१५॥

 

मंत्र का हिन्दी अनुवाद

जो लोग प्रजापति-व्रत का पालन करते हैं, वे संतति उत्पन्न करते हैं।  किन्तु उन्हीं के लिए वह ब्रह्मलोक है जिनका जीवन तपमय है, जिनमें ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठित है, और जिनमें सत्य स्थिर है। 

 

भावार्थ

यह मंत्र गृहस्थधर्म को केवल जैविक या सामाजिक संस्था मानकर आध्यात्मिक अनुशासन के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

उपनिषद् स्पष्ट करता है कि केवल संतति उत्पन्न करना पर्याप्त नहीं, तप, संयम, सत्य इनसे युक्त जीवन ही ब्रह्मलोक का अधिकारी बनता है।

 

अन्वय

ये वै तत् प्रजापतिव्रतं चरन्ति, ते मिथुनम् उत्पादयन्ति।
तेषाम् एव एषः ब्रह्मलोकः, येषाम् तपः, ब्रह्मचर्यम्, सत्यं प्रतिष्ठितम्।

 

संधि-विच्छेद

संधियुक्त पद

विच्छेद

संधि प्रकार

तद्ये

तत् + ये

व्यंजन संधि

हवै

+ वै

निपात

प्रजापतिव्रतम्

प्रजापतेः + व्रतम्

षष्ठी तत्पुरुष

मिथुनमुत्पादयन्ते

मिथुनम् + उत्पादयन्ते

व्यंजन संधि

तेषामेवैष

तेषाम् + एव + एषः

स्वर संधि

ब्रह्मलोको

ब्रह्म + लोकः

समास

येषु सत्यं

येषु + सत्यं

पदसंबन्ध


शब्दार्थ एवं व्याकरणिक विश्लेषण

. प्रजापतिव्रतम् : प्रजापति से सम्बन्धित व्रत। यहाँ गृहस्थधर्म और सन्तानोत्पत्ति का धर्मसम्मत विधान। 

. मिथुनम् : स्त्री-पुरुष संयोग। सृष्टि की निरन्तरता का साधन। 

. ब्रह्मलोकः ब्रह्मविद्या से सम्बद्ध उच्च लोक। अद्वैत दृष्टि में ब्रह्मप्राप्ति की अवस्था। 

. तपः आत्मसंयम, इन्द्रियनिग्रह,आन्तरिक अनुशासन। 

. ब्रह्मचर्यम् : यहाँ व्यापक अर्थ संयमित जीवन, धर्मानुकूल आचरण, चेतन ऊर्जा का संरक्षण। 

. सत्यं प्रतिष्ठितम् : जिनमें सत्य स्थिर हो गया है। सत्य केवल वाणी नहीं; अस्तित्वगत प्रामाणिकता। 

 

आदि शंकराचार्य भाष्य (संशोधित एवं शुद्ध रूप)

तत्र एवं सति ये गृहस्थाः वैइति प्रसिद्धस्मरणार्थो निपातः। तत् प्रजापतेः व्रतं ऋतौ भार्यागमनं चरन्ति कुर्वन्ति, तेषाम् एतत् फलम्। किम्? ते मिथुने पुत्रं दुहितरं उत्पादयन्ति। इदं फलम् इष्टापूर्तादिकर्मकारिणाम्। तेषाम् एव एषः यथोक्तः चान्द्रमसः ब्रह्मलोकः पितृयाणलक्षणः। येषां तपः स्नातकव्रतादीनि, ब्रह्मचर्यं , ऋतावन्यत्र मिथुनासमाचरणम्। येषु सत्यं अनृतवर्जनेन प्रतिष्ठितम्, अन्यथा आचारतया वर्तते नित्यम्॥

 

शंकरभाष्य का हिन्दी अनुवाद

शंकराचार्य कहते हैं

जो गृहस्थ प्रजापति-व्रत का पालन करते हैं अर्थात् ऋतुकाल में धर्मानुसार पत्नीगमन करते हैं वे पुत्र और पुत्री की उत्पत्ति करते हैं।

यह इष्टापूर्त आदि कर्म करने वाले गृहस्थों का फल है।ऐसे लोगों को चान्द्रमस ब्रह्मलोक अर्थात् पितृयान की प्राप्ति होती है।

किन्तु यह तभी सम्भव है जब उनमें तप, ब्रह्मचर्य, तथा सत्य ,प्रतिष्ठित हों।

यहाँ ब्रह्मचर्य का अर्थ है ऋतुकाल के अतिरिक्त मैथुन का त्याग।

और सत्य का अर्थ है अनृत का परित्याग कर सत्याचरण में स्थित रहना।

 

 

दार्शनिक विवेचन

. गृहस्थाश्रम की उपनिषदिक प्रतिष्ठा : यह मंत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ गृहस्थाश्रम को आध्यात्मिक मार्ग के रूप में स्वीकार किया गया है।

. “प्रजापतिव्रत” : सन्तानोत्पत्ति को केवल जैविक क्रिया नहीं माना गया। वह धर्म,उत्तरदायित्व,और सृष्टि-क्रम की निरन्तरता है।

. ब्रह्मचर्य की पुनर्व्याख्या :  शंकराचार्य का दृष्टिकोण अत्यन्त संतुलित है।वे गृहस्थ को भी ब्रह्मचारी मानते हैं यदि वह संयमित, ऋतुसंमत, धर्मानुकूल जीवन जीता हो।

. सत्य की सर्वोच्चता : उपनिषद् में सत्य केवल नैतिक गुण नहीं। वह ब्रह्म का स्वरूप है।

. तप का अर्थ : तप केवल कठिन तपस्या नहीं। वह आत्मानुशासन, संयम,सजगता है।

. ब्रह्मलोक की अवधारणा : यहाँ ब्रह्मलोककर्मप्रधान गृहस्थ के लिए उच्च लोक का प्रतीक है।

अद्वैत वेदान्त में इसका अंतिम अर्थ ब्रह्मप्राप्ति है।

 

अन्य उपनिषदों एवं ग्रन्थों से साम्य

तैत्तिरीय उपनिषद् : सत्यं वद धर्मं चर।

छान्दोग्य उपनिषद् : गृहस्थाश्रम को यज्ञात्मक जीवन कहा गया।

भगवद्गीता :  “युक्ताहारविहारस्य…”संयमित जीवन को योग का आधार बताया गया।

 

शोधपूर्ण निबंध

गृहस्थाश्रम और ब्रह्मचर्य : प्रश्नोपनिषद् की संतुलित दृष्टि

प्रश्नोपनिषद् का पञ्चदश मंत्र भारतीय जीवनदर्शन की उस गहन संतुलित परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें आध्यात्मिकता और सामाजिक जीवन परस्पर विरोधी नहीं हैं।

भारतीय परम्परा ने चार आश्रमों की व्यवस्था दी ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास। 

इनमें गृहस्थाश्रम को आधार कहा गया क्योंकि वही सम्पूर्ण सामाजिक संरचना का पोषक है।

किन्तु उपनिषद् गृहस्थजीवन को केवल भोगमय जीवन नहीं बनने देता। वह उसे तप, सत्य और संयम से जोड़ता है।

शंकराचार्य विशेष रूप से ऋतावन्यत्र मिथुनासमाचरणम्कहकर यह स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्मचर्य का अर्थ पूर्ण दमन नहीं, बल्कि सजग संयम है।

यह दृष्टि आधुनक मनोविज्ञान की भी स्मृति कराती है, जहाँ दमन की अपेक्षा संतुलित ऊर्जा-प्रबंधन को महत्त्व दिया जाता है।

 

प्रश्नोपनिषद् का पञ्चदश मंत्र गृहस्थजीवन को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान करता है।

यह मंत्र सिखाता है कि

· संयमित गृहस्थ भी ब्रह्ममार्ग का अधिकारी है,

· सत्य और तप के बिना जीवन अधूरा है,

· तथा वास्तविक ब्रह्मचर्य चेतन अनुशासन है। 

इस प्रकार यह मंत्र भारतीय आश्रमव्यवस्था, नैतिकता और वेदान्त तीनों का अत्यन्त सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है।

 

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