होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Thursday, 28 May 2026

धूप से मेरी गुफ़्तगू — अगला वरक़

 धूप से मेरी गुफ़्तगू — अगला वरक़

आज धूप

कुछ देर से आई।

मैंने सोचा,

शायद रास्ते में

किसी उदास खिड़की पर ठहर गई होगी।

जब वह कमरे में दाख़िल हुई,

तो उसके दामन में

हल्की-सी सर्दी थी।

वह चुपचाप

मेरी मेज़ पर बिखरे काग़ज़ों को देखती रही,

फिर एक अधूरी नज़्म पर ठहर गई।

“अब भी लिखते हो उसके बारे में?”

उसने पूछा।

मैं मुस्कुरा दिया।

“नहीं,”

मैंने कहा,

“अब तो बस

कुछ खाली जगहें लिखता हूँ,

जहाँ कभी वह हुआ करती थी।”

धूप ने

धीरे से मेरी उँगलियों को छुआ।

उसका स्पर्श वैसा था

जैसे किसी दरगाह में

पुराने चिराग़ की बची हुई गर्मी।

वह बोली 

“तुम इंसान भी अजीब हो।

जिसे पा नहीं सकते,

उसे हमेशा के लिए अपने भीतर बसा लेते हो।”


मैंने पूछा 

“और जो मिल जाए?”


धूप कुछ देर

दीवार पर टंगी घड़ी में चमकती रही।


फिर बोली —


“जो मिल जाता है,

वह अक्सर आदत बन जाता है।

और जो नहीं मिलता,

वह दुआ बनकर रह जाता है।”


उसकी बात सुनकर

कमरे में एक लंबी ख़ामोशी उतरी।


बाहर

पेड़ों से पत्ते गिर रहे थे।

इतने हल्के

कि गिरने की आवाज़ भी नहीं आती थी।


मैंने धीरे से कहा 

“क्या हर मोहब्बत

अधूरी ही होती है?”


धूप हँसी।

इस बार उसकी हँसी में

थोड़ी उदासी थी।


“नहीं,”

उसने कहा,

“कुछ मोहब्बतें पूरी भी होती हैं।

मगर पूरी होकर

वे कहानी नहीं रहतीं,

घर बन जाती हैं।”


फिर वह

धीरे-धीरे फ़र्श पर फैल गई।


और मुझे लगा

पूरा कमरा

रौशनी से नहीं,

किसी बहुत पुराने एहसास से भर गया है।


मुकेश ,,,

No comments:

Post a Comment