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Sunday, 24 May 2026

मीठी गोलियों वाला प्रेम

 मीठी गोलियों वाला प्रेम

अब जब उन दिनों को याद करता हूँ, तो सबसे पहले कोई चेहरा नहीं उभरता — बल्कि एक गंध उभरती है।

स्पिरिट की हल्की गंध।
पुरानी लकड़ी की अलमारियों की गंध।
और उन छोटी-छोटी सफ़ेद गोलियों की मीठी गंध, जो काँच की शीशियों में भरी रहती थीं।

वह होम्योपैथिक दवाखाना शहर की सबसे शांत जगहों में से एक था।

बाहर सड़क पर रिक्शे, सब्ज़ीवालों की आवाज़ें, बच्चों का शोर चलता रहता, लेकिन भीतर प्रवेश करते ही जैसे समय की चाल धीमी हो जाती।

दीवारों पर धूल लगी हुई अंग्रेज़ी दवाओं की सूचियाँ थीं।
एक पुराना पंखा घूमता रहता।
और काउंटर के पीछे बैठते थे डॉक्टर साहब — दुबले, सफ़ेद बालों वाले, इतने धीमे बोलने वाले आदमी कि कई बार लगता था वे मरीज़ों से नहीं, स्वयं अपने भीतर से बातचीत कर रहे हैं।

मैं वहाँ अपने लिए नहीं जाता था।

माँ को पुराना सिरदर्द रहता था। वही दवा लेने जाता था।

और वहीं मैंने उसे पहली बार देखा।

वह खिड़की के पास बैठी थी।

हल्के हरे रंग का सूती सलवार-कमीज़। बाल पीछे ढीले बँधे हुए। गोद में पानी की बोतल। और हाथ में एक छोटी काँच की शीशी, जिसे वह बहुत ध्यान से रोशनी की तरफ़ उठाकर देख रही थी, जैसे उसमें दवा नहीं, कोई बहुत निजी रहस्य भरा हो।

उस समय मेरी उम्र शायद उन्नीस रही होगी।
या बीस।

वह मुझसे कुछ वर्ष बड़ी लगती थी।
लेकिन कुछ स्त्रियों की उम्र उनके चेहरे से नहीं, उनकी थकान से समझ में आती है।

उसके चेहरे पर वही थकान थी।

डॉक्टर साहब ने मुझसे कहा—

“बैठ जाइए… थोड़ी देर लगेगी।”

मैं उसके सामने वाली बेंच पर बैठ गया।

बहुत देर तक हम दोनों चुप रहे।

दवाखाने की चुप्पियाँ अलग तरह की होती हैं। उनमें खाँसी, शीशियों की खनक और धीरे-धीरे खुलते रोगों की थकान मिली रहती है।

फिर अचानक उसने पूछा—

“आपको भी पुरानी बीमारी है?”

मैं थोड़ा घबरा गया।

“नहीं… माँ के लिए दवा लेने आया हूँ।”

उसने सिर हिलाया।

फिर कुछ देर बाद बोली—

“अच्छा है। अपनी बीमारी से ज़्यादा दूसरों की बीमारी झेलना आसान होता है।”

उस समय मैं इस वाक्य का अर्थ पूरी तरह नहीं समझ पाया था।

अब समझता हूँ — कुछ लोग अपने जीवन के सबसे गहरे दुख बहुत सपाट आवाज़ में कहते हैं।

धीरे-धीरे मैं वहाँ नियमित जाने लगा।

या शायद माँ की दवा वास्तव में उतनी जल्दी ख़त्म नहीं होती थी जितनी जल्दी मैं मान लेता था।

वह भी लगभग हर सप्ताह वहाँ मिल जाती।

कभी माइग्रेन।
कभी नींद न आना।
कभी घबराहट।
कभी “सिर्फ़ कमजोरी।”

मुझे धीरे-धीरे समझ आने लगा कि कुछ बीमारियाँ शरीर में नहीं, जीवन में होती हैं।

एक दिन बारिश हो रही थी। दवाखाने में भीड़ कम थी। डॉक्टर साहब भीतर किसी मरीज़ को देख रहे थे।

वह काउंटर पर झुककर छोटी-छोटी गोलियाँ काग़ज़ में डाल रही थी। अचानक उसने एक गोली उठाकर मेरी ओर बढ़ा दी।

“खाइए,” उसने कहा, “बहुत मीठी होती हैं।”

मैंने गोली मुँह में रख ली।

सचमुच मीठी थी।

लेकिन आज सोचता हूँ — शायद उस समय मुझे दवा से अधिक उस क्षण की निकटता मीठी लगी थी।

उसके बाद हमारी बातचीत बढ़ने लगी।

लेकिन वह वैसी बातचीत नहीं थी जैसी प्रेम कहानियों में होती है।

हम कभी “प्रेम” जैसी कोई बात नहीं करते थे।

हम मौसम की बात करते।
नींद की।
पुरानी किताबों की।
शरीर की छोटी तकलीफ़ों की।
और उन अजीब डराओं की, जिनका कोई स्पष्ट कारण नहीं होता।

एक दिन उसने अचानक पूछा—

“आपको कभी ऐसा लगता है कि कुछ लोग पूरी ज़िंदगी ठीक होने का इंतज़ार करते रहते हैं?”

मैंने कहा—
“किस बीमारी से?”

वह हल्का-सा मुस्कुराई।

“यही तो पता नहीं चलता।”

उसकी मुस्कान बहुत सुंदर नहीं थी।
लेकिन उसमें एक थकी हुई आत्मीयता थी, जो धीरे-धीरे आदमी को अपने पास खींचने लगती है।

मुझे उसकी उँगलियाँ याद हैं।

बहुत ठंडी रहती थीं।

और जब वह बात करते हुए अनजाने में शीशी का ढक्कन घुमाती रहती, तो लगता जैसे उसके भीतर कोई लगातार बेचैनी चल रही हो।

फिर एक दिन वह कई सप्ताह तक नहीं आई।

मैं हर बार दवाखाने में प्रवेश करते समय अनायास खिड़की की तरफ़ देखता।

खाली।

धीरे-धीरे मुझे अपने भीतर एक मूर्खतापूर्ण उदासी महसूस होने लगी।

तब पहली बार समझ में आया कि प्रेम कई बार बहुत धीरे शुरू होता है — इतना धीरे कि जब तक हम उसे पहचानते हैं, वह पहले ही हमारे भीतर फैल चुका होता है।

लगभग एक महीने बाद वह फिर दिखाई दी।

पहले से अधिक दुबली।
आँखों के नीचे हल्के काले घेरे।

मैंने शायद कुछ अधिक चिंता से पूछ लिया—

“आप ठीक हैं?”

वह कुछ क्षण चुप रही।
फिर बोली—

“हाँ… बस… थोड़ी जिंदगी बढ़ गई थी।”

मैं उस समय इस वाक्य को समझ नहीं पाया।
अब समझता हूँ।

उस दिन जाते-जाते उसने कहा—

“शायद अब मैं यहाँ कम आऊँगी।”

“क्यों?”

“आदमी अगर बहुत लंबे समय तक इलाज करवाता रहे तो बीमारी उसकी पहचान बन जाती है।”

फिर हल्का-सा हँसी।

“और कुछ लोग ठीक होना भी नहीं चाहते।”

उसके बाद वह सचमुच नहीं आई।

मैं कई महीनों तक उस दवाखाने जाता रहा। जबकि माँ की दवाएँ बंद हो चुकी थीं।

कई बार डॉक्टर साहब मुझे अजीब नज़रों से देखते।

एक दिन उन्होंने बहुत सहज स्वर में कहा—

“वो जो आपके साथ बैठती थीं… उनका तबादला हो गया शायद।”

मैंने सिर हिलाया।

बस इतना।

आज इतने वर्षों बाद भी, जब कभी किसी पुराने होम्योपैथिक दवाखाने से मीठी गोलियों की गंध आती है, या जब किसी काँच की शीशी में छोटी सफ़ेद दवाएँ दिखाई देती हैं, तब मुझे वह याद आती है।

और तब लगता है कि कुछ प्रेम वास्तव में होम्योपैथिक दवाओं जैसे होते हैं।

बहुत धीमे असर करने वाले।
लगभग अदृश्य।
पहले मामूली लगने वाले।

लेकिन एक बार भीतर घुल जाएँ तो वर्षों तक पूरी तरह समाप्त नहीं होते।

मुकेश ,,,,,,,

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