प्रश्नोपनिषद् — प्रथम प्रश्न — षोडश मंत्र
निष्काम ब्रह्मचर्य, दोषशून्यता और परमगति का उपनिषदिक रहस्य
मंत्र का मूल संस्कृत पाठ
तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको
न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥१६॥
मंत्र का हिन्दी अनुवाद
उन पुरुषों के लिए वह निष्कलुष ब्रह्मलोक है — जिनमें कुटिलता नहीं, असत्य नहीं, और छल-माया नहीं है।
भावार्थ
यह मंत्र प्रश्नोपनिषद् के प्रथम प्रश्न का चरम नैतिक-आध्यात्मिक निष्कर्ष है।
पूर्व मंत्रों में — तप, ब्रह्मचर्य, सत्य, संयम की चर्चा हुई थी; यहाँ उन सबका सार प्रस्तुत किया गया है।
उपनिषद् कहता है —
वास्तविक ब्रह्मलोक उन्हीं को प्राप्त होता है जिनका अन्तःकरण निष्कपट, सरल और सत्यनिष्ठ है।
अन्वय
तेषाम् असौ विरजः ब्रह्मलोकः,
येषु जिह्मम्, अनृतम्, माया च न अस्ति।
संधि-विच्छेद
संधियुक्त पद | विच्छेद | संधि प्रकार |
तेषामसौ | तेषाम् + असौ | व्यंजन संधि |
विरजो | विरजः | विसर्ग लोप |
ब्रह्मलोको | ब्रह्म + लोकः | समास |
नयेषु | न + येषु | पदविभाग |
जिह्ममनृतं | जिह्मम् + अनृतम् | व्यंजन संधि |
मायाचेति | माया + च + इति | स्वर संधि |
शब्दार्थ एवं व्याकरणिक विश्लेषण
१. विरजः “वि + रजस्” अर्थ — रजोगुण से रहित, मलरहित, निष्कलुष।
२. ब्रह्मलोकः यहाँ केवल कोई स्वर्गीय लोक नहीं। अद्वैत दृष्टि में —ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति।
३. जिह्मम् : कुटिलता,टेढ़ापन, आन्तरिक वक्रता। यह केवल व्यवहारिक छल नहीं; अन्तःकरण की सत्य वृत्ति है।
४. अनृतम् : असत्य, सत्य से विचलन।
५. माया : यहाँ “माया” अद्वैत की ब्रह्मशक्ति नहीं, बल्कि — कपट, छल, धोखा, आडम्बर।
आदि शंकराचार्य भाष्य (संशोधित एवं शुद्ध रूप)
तेषामसौ विरज इत्यादिवाक्यं व्याचष्टे — यैरिति। उत्तरायण इति, तेन प्राप्य इत्यर्थः। प्राणात्मभावोऽपरब्रह्मात्मतया अवस्थापनमित्यर्थः। असौ केषां तेषामिति। तेषामसौ विरज इत्यत्र “तेषाम्” इत्यनेन केषाम् निर्दिश्यते इति प्रश्नः। “न येषु जिह्मम्” इत्यत्र जिह्मादिशब्दं व्यतिरेकेण दर्शयति “यथा” इत्यादिना। मायाग्रहणं तादृशदोषाणामुपलक्षणमिति वदन् वाक्यार्थं संगृह्य दर्शयति — मायेति एवम्। भिक्षुषु इति परमहंसव्यतिरिक्तानां कुटीचकादीनां ग्रहणम्। तेषां ब्रह्मलोकादपि विरक्तत्वेन तत्र अनयित्वात्। इति च अर्थमाह — इत्येषः॥
शंकरभाष्य का हिन्दी अनुवाद
शंकराचार्य इस मंत्र की व्याख्या करते हुए कहते हैं —
यहाँ “उनके लिए वह निष्कलुष ब्रह्मलोक है” — इस वाक्य में “उनके” से आशय उन साधकों से है जिनमें कुटिलता, असत्य और माया नहीं है।
“माया” शब्द यहाँ केवल छल का द्योतक नहीं; वह ऐसे समस्त दोषों का संकेत है जो अन्तःकरण को अपवित्र करते हैं।
जो साधक निष्कपट हैं, सत्य में स्थित हैं और कपट से रहित हैं, वही ब्रह्मलोक के अधिकारी हैं।
शंकराचार्य आगे संकेत करते हैं कि उच्चतर संन्यासी — विशेषतः परमहंस — ब्रह्मलोक से भी परे ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति करते हैं।
दार्शनिक विवेचन
१. उपनिषद का नैतिक निष्कर्ष : प्रथम प्रश्न की यात्रा आरम्भ हुई थी — सृष्टि, प्रजापति, प्राण, रयि, काल, अन्न से। किन्तु उसका निष्कर्ष बाहरी ब्रह्माण्ड में नहीं, अन्तःकरण की शुद्धि में होता है।
२. “विरज” का गूढ़ अर्थ : “रजस्” केवल गुण नहीं। वह — अशान्ति, वासनात्मक चंचलता,मानसिक विक्षेप का प्रतीक है। “विरज” का अर्थ है — अन्तःकरण की पारदर्शिता।
३. जिह्मता : उपनिषद् के अनुसार आध्यात्मिकता का सबसे बड़ा शत्रु बाहरी अज्ञान नहीं, आन्तरिक वक्रता है।
४. सत्य और ब्रह्म : भारतीय दर्शन में सत्य केवल नैतिक नियम नहीं। “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।” सत्य स्वयं ब्रह्म का स्वरूप है।
५. माया का व्यावहारिक अर्थ : यहाँ माया अद्वैत की दार्शनिक “मायाशक्ति” नहीं। यह — सामाजिक छल, आध्यात्मिक दिखावा, आडम्बर का संकेत है।
६. ब्रह्मलोक और अद्वैत : शंकराचार्य यहाँ अत्यन्त सूक्ष्म संकेत देते हैं — सामान्य साधक ब्रह्मलोक तक जाते हैं, परमहंस उससे भी परे ब्रह्मस्वरूप में स्थित होते हैं।
अन्य उपनिषदों से साम्य
मुण्डक उपनिषद् : “सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा…”
कठोपनिषद् : “नाविरतो दुश्चरितात्…”
बृहदारण्यक उपनिषद् : “असतो मा सद्गमय…”
शोधपूर्ण निबंध
अन्तःकरण की शुद्धि : प्रश्नोपनिषद् का आध्यात्मिक निष्कर्ष
प्रश्नोपनिषद् का षोडश मंत्र भारतीय अध्यात्म की उस महान परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें आध्यात्मिक उपलब्धि का आधार बाहरी कर्मकाण्ड नहीं, अन्तःकरण की निर्मलता मानी गई है।
पूरे प्रथम प्रश्न में सृष्टि और काल का विस्तृत विवेचन हुआ — संवत्सर, मास, अहोरात्र, अन्न, रेतस्, प्रजा।
किन्तु अन्ततः उपनिषद् साधक को भीतर लौटा देता है।
वह कहता है — यदि अन्तःकरण में जिह्मता है, तो समस्त तप व्यर्थ है।
यहाँ “जिह्म” शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसका अर्थ केवल सामाजिक बेईमानी नहीं; बल्कि अस्तित्वगत वक्रता है — वह स्थिति जिसमें मनुष्य बाहर कुछ और, भीतर कुछ और होता है।
आधुनिक जीवन में यह स्थिति और भी व्यापक हो गई है। मनुष्य की सार्वजनिक छवि और आन्तरिक जीवन के बीच गहरी दूरी उत्पन्न हो चुकी है।
उपनिषद् इसी विभाजन को आध्यात्मिक पतन मानता है।
शंकराचार्य “माया” को समस्त दोषों का उपलक्षण बताते हैं। अर्थात् छल केवल व्यवहारिक समस्या नहीं; वह आत्मज्ञान में सबसे बड़ी बाधा है।
प्रश्नोपनिषद् का षोडश मंत्र प्रथम प्रश्न का आध्यात्मिक शिखर है।
यह सिखाता है कि —
· सत्य के बिना ब्रह्मविद्या सम्भव नहीं,
· निष्कपटता ही वास्तविक तप है,
· और निर्मल अन्तःकरण ही ब्रह्मलोक का अधिकारी है।
इस प्रकार यह मंत्र सम्पूर्ण प्रश्नोपनिषद् की नैतिक और आध्यात्मिक दिशा को अत्यन्त सूक्ष्म और गम्भीर रूप में उद्घाटित करता है।
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