होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Thursday, 28 May 2026

धूप से मेरी गुफ़्तगू — छाँह के बारे में

 धूप से मेरी गुफ़्तगू — छाँह के बारे में


आज धूप

कुछ थकी हुई लगी।


वह खिड़की से अंदर आई

और बिना शरारत किए

सीधे फ़र्श पर बैठ गई।


मैंने पूछा 

“क्या बात है?

आज इतनी ख़ामोश क्यों हो?”


धूप ने

दीवार पर टंगी पेड़ की परछाईं को देखा

और धीमे से बोली —


“मैं सारी उम्र

छाँह को जन्म देती रही,

मगर लोग

मुझे याद रखते हैं,

उसे नहीं।”


मैं चुप हो गया।


कमरे में

नीम की शाखों से छनकर आती रोशनी थी।

फ़र्श पर

उजाले और अँधेरे के छोटे-छोटे टुकड़े बिखरे थे,

जैसे किसी सूफ़ी ने

जायनमाज़ पर चाँदी के सिक्के रख दिए हों।


मैंने उससे पूछा 

“क्या तुम्हें छाँह से मोहब्बत है?”


धूप मुस्कुराई।


“मोहब्बत?”

वह बोली,

“मैं उसके बिना पूरी ही नहीं होती।


जहाँ मैं सबसे ज़्यादा चमकती हूँ,

वहीं सबसे गहरी छाँह जन्म लेती है।”


फिर वह कुछ देर

खिड़की के पास रखे गमले में ठहरी रही।


मिट्टी की नमी से

हल्की-सी भाप उठ रही थी।


धूप ने कहा 


“तुम इंसान भी

कुछ ऐसे ही हो।


तुम अपनी रौशनी सबको दिखाते हो,

मगर जो तुम्हें सचमुच समझता है,

वह तुम्हारी छाँह पढ़ता है।”


मैंने पूछा 

“छाँह क्या होती है?”


धूप ने

मेरे चेहरे पर उतरते हुए कहा —


“तुम्हारे भीतर की

वह जगह

जहाँ तुम दुनिया से नहीं,

ख़ुद से छिपते हो।


तुम्हारे डर,

तुम्हारी थकान,

तुम्हारी अधूरी दुआएँ 

सब वहीं बैठी रहती हैं।”


बाहर

एक बच्चा पेड़ के नीचे खेल रहा था।

धूप उसके बालों पर थी,

और छाँह उसके पैरों में।


मैं देर तक

उसे देखता रहा।


फिर धूप ने

बहुत धीमी आवाज़ में कहा 


“याद रखना,

जो आदमी

अपनी छाँह से दोस्ती कर लेता है,

उसे फिर

किसी रौशनी से डर नहीं लगता।”


मुकेश ,,,,,

No comments:

Post a Comment