प्रश्नोपनिषद् — प्रथम प्रश्न — त्रयोदश मंत्र
अहोरात्र, प्राण-रयि और गृहस्थधर्म का उपनिषदिक विवेचन
मंत्र का मूल संस्कृत पाठ
अहोरात्रो वै प्रजापतिः ।
तस्याह एव प्राणः ।
रात्रिरेव रयिः ।
ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते प्राणमेव तद् स्कन्दन्ति ।
ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥१३॥
मंत्र का हिन्दी अनुवाद
अहोरात्र (दिन-रात्रि) ही प्रजापति है।
उसमें दिन प्राणस्वरूप है और रात्रि रयि (भौतिक पक्ष) है।
जो लोग दिन में मैथुन करते हैं, वे अपने प्राण का ही क्षय करते हैं।
किन्तु जो रात्रि में ऋतुकालानुसार संयमपूर्वक मैथुन करते हैं, वह ब्रह्मचर्य के तुल्य माना गया है।
भावार्थ
यह मंत्र केवल सामाजिक नियम नहीं दे रहा, बल्कि जीवनशक्ति और चेतना के संरक्षण का आध्यात्मिक सिद्धान्त प्रस्तुत कर रहा है।
यहाँ —
· दिन = प्राण = चेतना
· रात्रि = रयि = प्रकृति
का प्रतीक है।
अन्वय
अहोरात्रः वै प्रजापतिः।
तस्य अहः एव प्राणः।
रात्रिः एव रयिः।
ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते, ते प्राणम् एव स्कन्दन्ति।
यत् रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते, तत् ब्रह्मचर्यम् एव।
संधि-विच्छेद
संधियुक्त पद | विच्छेद | संधि प्रकार |
अहोरात्रो | अहः + रात्रः | विसर्ग संधि |
तस्याह | तस्य + अहः | स्वर संधि |
रात्रिरेव | रात्रिः + एव | विसर्ग संधि |
संयुज्यन्ते | सम् + युज्यन्ते | उपसर्ग |
प्राणमेव | प्राणम् + एव | व्यंजन संधि |
तद्यद्रात्रौ | तत् + यत् + रात्रौ | व्यंजन संधि |
ब्रह्मचर्यमेव | ब्रह्मचर्यम् + एव | व्यंजन संधि |
शब्दार्थ एवं व्याकरणिक विश्लेषण
१. अहोरात्रः अहः + रात्रि। दिन और रात्रि का संयुक्त चक्र।
२. प्राणः जीवनशक्ति। ऊर्जा, चेतना, तेज।
३. रयिः प्रकृति, भोग, पदार्थ।
४. स्कन्दन्ति : धातु — “स्कन्द्” अर्थ — गिराना,क्षीण करना, नष्ट करना।
५. ब्रह्मचर्यम् : यहाँ अत्यन्त सूक्ष्म अर्थ है।केवल पूर्ण संयम नहीं, बल्कि — धर्मानुकूल, संयमित और चेतन जीवन।
आदि शंकराचार्य भाष्य (संशोधित एवं शुद्ध रूप)
सः अपि मासात्मा प्रजापतिः स्वावयवे अहोरात्रे परिसमाप्यते। तस्य अपि अहः एव प्राणः आदित्यात्मा। रात्रिः एव रयिः पृथिवीवत्। प्राणम् अहरात्मानं वा एते स्कन्दन्ति निगलयन्ति शोषयन्ति वा स्वात्मनः विच्छित्तिं कुर्वन्ति। के? ये दिवा अहनि रत्या स्त्रीकरणभूतया सह संयुञ्जते मिथुनं मैथुनम् आचरन्ति। यत् एवं तस्मात् तन्न कर्तव्यमिति प्रतिषेधः प्रासङ्गिकः। यत् वा रात्रौ संयुज्यन्ते रत्या ऋतौ, ब्रह्मचर्यमेव तत् इति प्रशस्तत्वात्। एतत् भार्यागमनं कर्तव्यमिति उपसंहारः। सः अहोरात्रात्मकः प्रजापतिः व्रीहियवाद्यन्नात्मना व्यवस्थितः॥
शंकरभाष्य का हिन्दी अनुवाद
शंकराचार्य कहते हैं — मासरूप प्रजापति आगे दिन और रात्रि में विभक्त होता है।
उसमें —दिन प्राणस्वरूप और आदित्यात्मक है, रात्रि रयिस्वरूप और पृथ्वीवत् है।
जो लोग दिन में मैथुन करते हैं, वे अपने प्राण का क्षय करते हैं।
वे अपनी जीवनशक्ति को नष्ट करते हैं।
इसलिए दिन में मैथुन का निषेध किया गया है।
किन्तु जो लोग रात्रि में ऋतुकालानुसार संयमपूर्वक दाम्पत्य संबंध करते हैं, वह ब्रह्मचर्य के तुल्य माना गया है, क्योंकि वह धर्मसम्मत और संयमित है।
दार्शनिक विवेचन
१. प्राण और रयि का पुनः विभाजन
उपनिषद् बार-बार एक ही द्वैत का प्रयोग करता है —
प्राण | रयि |
चेतना | पदार्थ |
सूर्य | चन्द्र |
दिन | रात्रि |
ऊर्जा | भोग |
२. मैथुन का आध्यात्मिक दृष्टिकोण : यहाँ उपनिषद् काम का निषेध नहीं करता। वह असंयम का निषेध करता है।
३. ब्रह्मचर्य की व्यापक अवधारणा : शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं —धर्मसम्मत, संयमित दाम्पत्य भी ब्रह्मचर्य का अंग हो सकता है।यह अत्यन्त संतुलित भारतीय दृष्टि है।
४. प्राणक्षय : दिन यहाँ सक्रिय चेतना का प्रतीक है।दिन में इन्द्रियभोग को जीवनशक्ति के ह्रास के रूप में देखा गया।
५. गृहस्थाश्रम की मान्यता : उपनिषद् संन्यासमात्र की शिक्षा नहीं देता।वह संयमित गृहस्थजीवन को भी आध्यात्मिक मार्ग मानता है।
अन्य उपनिषदों एवं ग्रन्थों से साम्य
छान्दोग्य उपनिषद् : गृहस्थधर्म और संयम की प्रशंसा।
भगवद्गीता : “युक्ताहारविहारस्य…”संयमित जीवन ही योग का आधार है।
मनुस्मृति : धर्मानुकूल दाम्पत्य को आश्रमधर्म का अंग माना गया।
शोधपूर्ण निबंध
ब्रह्मचर्य की उपनिषदिक पुनर्व्याख्या
प्रश्नोपनिषद् का त्रयोदश मंत्र भारतीय जीवनदर्शन की उस संतुलित दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें आध्यात्मिकता और जीवनव्यवहार परस्पर विरोधी नहीं हैं।
आधुनिक धारणा में ब्रह्मचर्य प्रायः केवल यौन-संयम तक सीमित कर दिया गया है। किन्तु उपनिषद् इसे व्यापक अर्थ में देखता है।
ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ है — ब्रह्म में स्थित होकर जीवन जीना।
इस दृष्टि से असंयमित भोग प्राणक्षय है, जबकि धर्मानुकूल और संयमित गृहस्थजीवन भी आध्यात्मिक हो सकता है।
शंकराचार्य की व्याख्या यहाँ विशेष महत्त्वपूर्ण है। वे मैथुन का पूर्ण निषेध नहीं करते; वे चेतन अनुशासन पर बल देते हैं।
यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि उसने काम को पाप नहीं माना; बल्कि उसे धर्म और संयम के भीतर प्रतिष्ठित किया।
प्रश्नोपनिषद् का त्रयोदश मंत्र जीवनशक्ति, संयम और गृहस्थधर्म का अत्यन्त सूक्ष्म आध्यात्मिक विवेचन प्रस्तुत करता है।
यह मंत्र सिखाता है कि —
· प्राण का संरक्षण ही आध्यात्मिकता का आधार है,
· असंयम प्राणक्षय है,
· और संयमित जीवन ही वास्तविक ब्रह्मचर्य है।
इस प्रकार यह मंत्र भारतीय आश्रमव्यवस्था, दाम्पत्यदर्शन और योगपरम्परा — तीनों का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है।
मुकेश ,,,,,,,
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