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Sunday, 24 May 2026

प्रश्नोपनिषद् — प्रथम प्रश्न — चतुर्दश मंत्र अन्न, रेतस् और सृष्टि-चक्र का उपनिषदिक रहस्य

 प्रश्नोपनिषद् प्रथम प्रश्न चतुर्दश मंत्र

अन्न, रेतस् और सृष्टि-चक्र का उपनिषदिक रहस्य

मंत्र का मूल संस्कृत पाठ

अन्नं वै प्रजापतिः
ततो वै तद्रेतः
तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्ते ॥१४॥

 

मंत्र का हिन्दी अनुवाद

अन्न ही प्रजापति है।
उसी अन्न से रेतस् (वीर्य) उत्पन्न होता है,
और उसी से ये समस्त प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं।

 

भावार्थ

यह मंत्र सृष्टि की भौतिक और जैविक प्रक्रिया को आध्यात्मिक दृष्टि से प्रस्तुत करता है।

यहाँ

· अन्न = सृष्टि का स्थूल आधार,

· रेतस् = जीवनबीज,

· प्रजा = समस्त जीवसृष्टि। 

उपनिषद् बताता है कि सम्पूर्ण जीवन अन्न से पोषित और उत्पन्न होता है।

 

अन्वय

अन्नम् वै प्रजापतिः।
ततः वै तत् रेतः।
तस्मात् इमाः प्रजाः प्रजायन्ते।

 

संधि-विच्छेद

संधियुक्त पद

विच्छेद

संधि प्रकार

अन्नंवै

अन्नम् + वै

व्यंजन संधि

ततोहवै

ततः + + वै

विसर्ग संधि

तद्रेतः

तत् + रेतः

व्यंजन संधि

तस्मादिमाः

तस्मात् + इमाः

व्यंजन संधि

प्रजायन्ते

प्र + जायन्ते

उपसर्ग

 

शब्दार्थ एवं व्याकरणिक विश्लेषण

. अन्नम् : धातु — “अद्” (भक्षणे) अर्थ जो खाया जाए, पोषण का आधार। वैदिक दर्शन में अन्न केवल भोजन नहीं; सम्पूर्ण स्थूल प्रकृति है।

. प्रजापतिः सृष्टिकर्ता, प्राणियों का स्वामी। यहाँ अन्न को ही सृजनशक्ति कहा गया।

. रेतः वीर्य, सृजनबीज, जीवनशक्ति। 

. प्रजाः उत्पन्न जीव, समस्त सृष्टि। 

आदि शंकराचार्य भाष्य (संशोधित एवं शुद्ध रूप)

एवं क्रमेण परेण परेण तदन्नं वै प्रजापतिः। कथम्? ततः तस्माद्ध वै रेतः अनुबीजं तन्निमित्तकारणम्। तस्मात् योषिति सिक्तात् इमाः मनुष्यादिलक्षणाः प्रजाः प्रजायन्ते। यत् पृष्टं — “कुतो वै प्रजाः प्रजायन्तेइति, तदेवं चन्द्रादित्यमिथुनादाक्रमणात् अहोरात्रान्तेन अन्नाख्यरेतोद्भवेन इमाः प्रजाः प्रजायन्ते इति निर्णीतम्॥

 

शंकरभाष्य का हिन्दी अनुवाद

शंकराचार्य कहते हैं

इस प्रकार क्रमशः आगे बढ़ते हुए अन्न को प्रजापति कहा गया है। क्योंकि उसी अन्न से रेतस् (वीर्य) उत्पन्न होता है, जो सृष्टि का कारण बनता है। स्त्री में उस बीज के स्थापित होने से मनुष्य आदि प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं।अतः कबन्धी के प्रश्न — “ये प्राणी कहाँ से उत्पन्न होते हैं?”

का उत्तर यह है कि चन्द्र और आदित्यरूप प्राण-रयि के क्रम से, दिन-रात्रि के चक्र से, और अन्ततः अन्न तथा रेतस् के माध्यम से यह सम्पूर्ण सृष्टि उत्पन्न होती है।

 

दार्शनिक विवेचन

. अन्न का आध्यात्मिक महत्त्व : उपनिषद् अन्न को केवल खाद्य नहीं मानता।  अन्न जीवन, ऊर्जा, सृष्टि, शरीर का आधार है।

. “अन्नं ब्रह्म” : यह विचार आगे चलकर तैत्तिरीय उपनिषद् में अत्यन्त विकसित रूप में मिलता है।

तैत्तिरीय उपनिषद् : अन्नं ब्रह्मेति…”

. रेतस् का दार्शनिक अर्थ : रेतस् केवल जैविक वीर्य नहीं। वह सृजनशक्ति, जीवन-ऊर्जा, ब्रह्माण्डीय उत्पादकता  का प्रतीक है।

. सृष्टि का क्रम

यहाँ उपनिषद् एक अद्भुत क्रम देता है

स्तर

तत्त्व

ब्रह्माण्डीय

सूर्य-चन्द्र

कालिक

संवत्सर-मास-अहोरात्र

भौतिक

अन्न

जैविक

रेतस्

जीवोत्पत्ति

प्रजा

 

. सूक्ष्म और स्थूल का सम्बन्ध

उपनिषद् का एक बड़ा सिद्धान्त यहाँ प्रकट होता है ब्रह्माण्ड और शरीर परस्पर सम्बद्ध हैं।

 

वैदिक एवं उपनिषदिक सन्दर्भ

तैत्तिरीय उपनिषद् : अन्नाद् भवन्ति भूतानि…” सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं।

छान्दोग्य उपनिषद् : अन्न से मन, प्राण और वीर्य की उत्पत्ति का विवेचन।

भगवद्गीता : अन्नाद् भवन्ति भूतानि…” (.१४)

 

शोधपूर्ण निबंध

अन्न से ब्रह्माण्ड तक : प्रश्नोपनिषद् का जीवनदर्शन

प्रश्नोपनिषद् का चतुर्दश मंत्र भारतीय जीवनदर्शन की अत्यन्त वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टि को उद्घाटित करता है।

आधुनिक विज्ञान कहता है कि जीवन ऊर्जा और पदार्थ की जटिल प्रक्रिया से उत्पन्न होता है। उपनिषद् भी इसी सत्य को अपने प्रतीकात्मक ढंग से व्यक्त करता है।

यहाँ अन्न को प्रजापति कहा गया। इसका अर्थ है कि अन्न केवल पोषण नहीं; वह जीवन-सृजन की मूल शक्ति है।

भारतीय संस्कृति में अन्न को देवता माना गया। भोजन से पूर्व प्रार्थना, अन्न का सम्मान, अन्नदान की महिमा ये सब इसी उपनिषदिक दृष्टि से उत्पन्न हुए।

शंकराचार्य इस मंत्र को केवल भौतिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रखते। वे इसे प्राण-रयि के व्यापक ब्रह्माण्डीय सिद्धान्त से जोड़ते हैं।

इस प्रकार सूर्य और चन्द्र, कालचक्र, दिन-रात्रि, अन्न, रेतस्, प्रजा  सब एक अखण्ड सृष्टि-क्रम के अंग बन जाते हैं।

यह दृष्टि आधुनिक पारिस्थितिकी (ecology) की भी स्मृति कराती है, जहाँ सम्पूर्ण जीवन परस्पर सम्बद्ध माना जाता है।

 

प्रश्नोपनिषद् का चतुर्दश मंत्र सृष्टि, अन्न और जीवन के गहरे सम्बन्ध को उद्घाटित करता है।

यह मंत्र सिखाता है कि

· अन्न ही जीवन का आधार है,

· रेतस् सृजन की शक्ति है,

· और सम्पूर्ण प्रजा उसी जीवनचक्र की अभिव्यक्ति है। 

इस प्रकार यह मंत्र भारतीय जीवनदर्शन, पारिस्थितिकी, जैविक चेतना और आध्यात्मिक प्रतीकवाद का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है।

तत्रैवं सतिये गृहध्याः वे इति परसिद्धस्मरणाथां निपातो ततप्रजापतेव्रतमृतां भायोगमन चरन्ति कुषन्ति तेषां इष्फरुमिदध | - किम् ते मिथुने पुत्रं दुहितरं चोत्पादयन्ते अदं फरमिष्टपृतेदतकारिणां तेपामवेष यथ्ान्द्रमसाो ब्रह्मराकः पितुयाणलक्षणो येषां तपः स्नातकव्रतादीनिः ब्रह्म चयम् ऋतावन्यन्न भयुनासमाचरण ब्रह्म चय् येषु सत्यमनतवमेन प्रतिाषटतमन्या मचारतया वतते नित्यमेवं १५

 मुकेश ,,,,,,,

 

 

 

 

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