धूप ने मुझसे एक दिन कहा
“तुम हर शाम को
अंत क्यों समझ लेते हो?”
मैंने खिड़की खोली,
तो सचमुच
आसमान कहीं से टूटा हुआ नहीं था।
बस बादल थे,
आते-जाते हुए।
तब पहली बार लगा
कि दुख स्थायी नहीं होते,
वे प्रवासी पक्षियों की तरह होते हैं —
कुछ मौसम हमारे भीतर बिताकर
उड़ जाते हैं।
और जीवन?
वह तो हर सुबह
नई कमीज़ पहनकर लौट आता है।
कभी बारिश बनकर,
कभी धूप में सूखती किताबों की गंध बनकर,
कभी अचानक
पुराने दोस्त के फ़ोन की हँसी बनकर।
मैंने अब
छोटी चीज़ों में उजाला ढूँढना सीख लिया है।
चाय उबलते वक़्त
जो भाप उठती है,
उसमें भी एक घर बसता है।
माँ के हाथों की सिलवटों में,
बच्चों की बेमतलब दौड़ में,
रात के आख़िरी पहर
कुत्तों के भौंकने में भी
जीवन अपनी उपस्थिति दर्ज करता रहता है।
अब मैं जान गया हूँ
उम्मीद
कोई बड़ी चीज़ नहीं होती।
वह बस
थके हुए आदमी के कंधे पर रखा
एक हल्का-सा हाथ होती है।
और ख़ुशी?
वह हमेशा शोर में नहीं मिलती।
कई बार
वह बरामदे में रखी कुर्सी पर
शाम की हवा के साथ
चुपचाप बैठी मिलती है।
जीवन ने बहुत कुछ छीना,
यह सच है।
मगर उसने
हर बार कुछ नया उगने की जगह भी छोड़ी।
पेड़ अगर पतझड़ से डरते,
तो नई पत्तियाँ कहाँ से आतीं?
इसलिए अब
जब कोई मौसम बदलता है,
मैं घबराता नहीं।
मैं जानता हूँ
हर समाप्ति के भीतर
एक अदृश्य बीज रखा होता है,
जो सही वक़्त पर
फिर से हरा हो जाएगा।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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