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Friday, 20 February 2026

बर्फ़ के नीचे जो चुपचाप बहती हैं नदियाँ

 बर्फ़ के नीचे बहती नदियाँ"


बर्फ़ के नीचे

जो चुपचाप बहती हैं नदियाँ

वो किसी सज़ा की तरह नहीं

बल्कि सब्र की आख़िरी हद होती हैं।


बर्फ़ की सतह 

सुनसान, सपाट, बेहरकत

मानो वक़्त वहीं थम गया हो,

जैसे सारी कायनात ने

सांस रोके रखी हो

पर अंदर…

बहाव जारी रहता है

मद्धम, मगर यक़ीन से भरा।


वो नदियाँ

हर उस चीख़ को समेटे चलती हैं

जो कभी बाहर न आ सकी

हर उस आँसू को

जो आँख से नहीं,

रूह से टपका था।


ज़मीन ऊपर से सर्द है

लेकिन नीचे

हर क़तरा तपता है

हर कण में बेचैनी है

हर बूँद को है

दोपहर की धूप का इंतज़ार।


इन नदियों ने सीखा है

बोलना ख़ामोशी से,

तूफ़ानों को पालना

चुप की कोख में,

और उम्मीद को

हर जमावट के नीचे

ज़िंदा रखना।


वो नहीं पूछतीं

कब टूटेगा ये बर्फ़ का कफ़न,

कब मिलेगा उन्हें आसमान

कब गूंजेगी उनके बदन में

पानी की खनकती हँसी 

वो बस बहती हैं

हर रोज़, हर लम्हा

एक नए मौसम के यक़ीन में।


बर्फ़ के नीचे बहती नदियाँ 

तुम्हारी तरह हैं, मेरी तरह हैं,

हर उस दिल की तरह हैं

जो बाहर से ख़ामोश है

मगर अंदर से

इंक़लाब लिख रहा है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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