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Thursday, 12 March 2026

अध्याय – 05 : कप, चम्मच और तश्तरी की धीमी बातचीत

 लघु उपन्यास – दूसरा खंड

अध्याय – 05 : कप, चम्मच और तश्तरी की धीमी बातचीत


इस वक़्त

मैं सिर्फ़ चाय पी रहा हूँ।


सचमुच

सिर्फ़ चाय।


न कोई किताब खुली है

न कोई विचार लिख रहा हूँ।


मैं बस

द्रष्टा भाव में बैठा हूँ।


पहले

प्याली को थोड़ा-सा झुकाकर

चाय को ठंडा करता हूँ।


फिर

हौले से

फूँक मारता हूँ।


फिर

एक छोटी-सी घूँट।


और उस घूँट का स्वाद

धीरे-धीरे

जीभ से उतरकर

गले में

फिर पूरे शरीर में

और अंततः

मन में फैल जाता है।


इस समय

मुझे नहीं मालूम

इसे ध्यान कहूँ

या

तुरीय की कोई हल्की-सी छाया।


पर इतना तय है—


मेरे भीतर

सब कुछ

थोड़ा धीमा हो गया है।


कमरा

और भी शांत।


हवा

और भी स्थिर।


और इसी स्थिरता में

अचानक मुझे लगा—


मेरे सामने रखे

कप, तश्तरी और चम्मच

आपस में

धीरे-धीरे

कुछ बातें कर रहे हैं।


पहले तो मुझे लगा

यह मेरी कल्पना होगी।


पर कुछ क्षण बाद

उनकी आवाज़

जैसे साफ़ होने लगी।


चम्मच

जो अभी-अभी

चीनी घोलकर

कप के भीतर से निकला था

थोड़ा-सा गर्व से बोला—


“देखा?

मेरे बिना

यह चाय इतनी मीठी नहीं होती।”


कप

हल्के से मुस्कुराया।


“सही है,”

वह बोला,

“पर तुम्हारे बिना चाय अधूरी है

और मेरे बिना

तुम्हारी मेहनत बेकार।”


तश्तरी

अब तक चुप थी।


वह नीचे

बहुत शांत

सब कुछ संभाले बैठी थी।


उसने धीरे से कहा—


“और मेरे बिना

तुम दोनों

टेबल पर गिर जाओगे।”


तीनों कुछ क्षण

चुप हो गए।


मैं

अपनी अगली घूँट लेते हुए

उनकी बातचीत सुनता रहा।


चम्मच ने फिर कहा—


“मेरा काम

हिलाना है।”


“जहाँ मैं जाता हूँ

वहाँ स्थिरता टूटती है।”


कप ने उत्तर दिया—


“और मेरा काम

धारण करना है।”


“अगर सब कुछ

सिर्फ़ हिलता ही रहे

तो कोई स्वाद

ठहर नहीं सकता।”


तश्तरी ने

बहुत शांत स्वर में कहा—


“और मेरा काम

बस संभालना है।”


“मैं किसी को हिलाती नहीं

किसी को भरती नहीं

पर

अगर मैं न रहूँ

तो यह छोटा-सा संसार

टिक नहीं पाएगा।”


मैंने

धीरे से

एक और घूँट ली।


चाय अब बिल्कुल सही तापमान पर थी।


मुझे अचानक लगा—


यह कोई साधारण बातचीत नहीं है।


यह तो

मानव जीवन का

एक छोटा-सा दर्शन है।


चम्मच

विचार की तरह है—


जो हर चीज़ को

हिलाता रहता है।


कप

अनुभव की तरह—


जो जीवन को

अपने भीतर रखता है।


और तश्तरी—


शायद

मौन की तरह।


जो सबको

आधार देता है

पर स्वयं

कुछ नहीं कहता।


मैंने कप को

फिर से तश्तरी पर रखा।


चम्मच

हल्की-सी खनखनाहट के साथ

उससे टकराया।


और फिर

तीनों

एकदम शांत हो गए।


जैसे उन्होंने

अपनी छोटी-सी सभा

समाप्त कर दी हो।


मैंने खिड़की की ओर देखा।


सुबह की रोशनी

धीरे-धीरे कमरे में आ रही थी।


और मुझे लगा—


कभी-कभी

सबसे बड़े दर्शन

विश्वविद्यालयों में नहीं

मंदिरों में नहीं

पुस्तकों में भी नहीं—


बल्कि


एक छोटे-से कमरे में

एक शांत सुबह में

और


एक कप चाय के आसपास

धीरे-धीरे जन्म लेते हैं।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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