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Sunday, 15 March 2026

लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी -भाग – 3 -अध्याय 13 : दोपहर का मौन

 लघु उपन्यास : अस्तित्व और साक्षी -भाग – 3 -अध्याय 13 : दोपहर का मौन

कभी-कभी किसी रहस्य का सबसे गहरा हिस्सा वह नहीं होता जो सामने कहा गया हो

बल्कि वह होता है जो कहा नहीं गया।

प्रवासी के जाने के बाद घाट पर कुछ देर तक वही शांति बनी रही।

नदी वैसे ही बह रही थी जैसे हजारों वर्षों से बहती आई होगी।

उसके प्रवाह में किसी भी तरह की उत्सुकता नहीं थी—मानो मनुष्यों के प्रश्न उसके लिए बहुत छोटे हों।

नील ने अंततः चुप्पी तोड़ी।

“मुझे समझ में नहीं आता कि अभी जो हुआ वह साधारण था या असाधारण।”

अस्तित्व ने हल्के स्वर में कहा

“शायद दोनों।”

साक्षी अब भी नदी की ओर देख रही थी।

उसके चेहरे पर एक ऐसी गंभीरता थी जो पहले नहीं थी।

“तुम दोनों ने उसकी आँखें देखीं?” उसने धीरे से पूछा।

नील ने कंधे उचकाए।

“देखीं… पर उनमें ऐसा क्या था?”

साक्षी ने उत्तर नहीं दिया।

कुछ क्षण बाद उसने कहा

“ऐसा लगा जैसे वह हमें पहचानता हो।”

नील हँस पड़ा।

“यह तो तुम भी कह रही हो और अस्तित्व भी… पर उसने साफ कहा कि वह हमें नहीं जानता।”

अस्तित्व ने धीरे से कहा

“कभी-कभी पहचान का अर्थ जान-पहचान नहीं होता।”

तीनों कुछ देर सीढ़ियों पर बैठ गए।

दोपहर की धूप अब धीरे-धीरे तेज़ होने लगी थी।

घाट पर कुछ स्थानीय लोग भी आने लगे थे—कोई स्नान करने, कोई पूजा करने।

जीवन अपने सामान्य ढंग से चल रहा था।

लेकिन अस्तित्व के भीतर कुछ सामान्य नहीं था।

उसके मन में वही प्रश्न बार-बार लौट रहा था

प्रवासी ने कहा—यह जगह तुम्हें जानती है।

इस वाक्य का अर्थ क्या हो सकता है?

नील ने अचानक कहा

“वैसे हमें ठहरने के लिए जगह भी ढूँढनी चाहिए।”

साक्षी ने सहमति में सिर हिलाया।

घाट से थोड़ा ऊपर एक छोटा-सा कस्बा था।

पत्थर की सँकरी गलियाँ, पुराने घर, और हर मोड़ पर किसी मंदिर की घंटियों की ध्वनि।

कुछ ही देर में उन्हें एक पुराना सा धर्मशाला-नुमा विश्राम गृह मिल गया।

उसके आँगन में एक बड़ा नीम का पेड़ था।

कमरा साधारण था—एक खिड़की, दो चारपाइयाँ, और दीवार पर समय से फीकी पड़ चुकी चूना-पुताई।

नील ने बैग रखकर कहा

“कम से कम यहाँ शांति तो है।”

अस्तित्व खिड़की के पास खड़ा हो गया।

दूर नीचे घाट और नदी दिखाई दे रही थी।

साक्षी ने धीरे से पूछा

“तुम अभी भी उसी के बारे में सोच रहे हो?”

अस्तित्व ने कहा

“हाँ… लेकिन केवल उसके बारे में नहीं।”

“और किस बारे में?”

अस्तित्व कुछ क्षण चुप रहा।

फिर उसने कहा

“तुम्हारी डायरी के बारे में।”

साक्षी थोड़ी देर शांत रही।

“तुम्हें लगता है कि दोनों बातों में कोई संबंध है?”

अस्तित्व ने धीरे-धीरे सिर हिलाया।

“संभव है।”

नील अब तक बिस्तर पर लेट चुका था।

“मुझे तो लगता है कि तुम दोनों हर चीज़ में रहस्य ढूँढ लेते हो।”

साक्षी हल्के से मुस्कराई।

“और तुम्हें हर चीज़ को सामान्य मान लेने की आदत है।”

नील ने आँखें बंद करते हुए कहा

“क्योंकि अक्सर चीज़ें सच में सामान्य ही होती हैं।”

कुछ देर में वह सो गया।

कमरे में हल्की निस्तब्धता फैल गई।

खिड़की से आती हवा में नदी की नमी थी।

साक्षी धीरे-धीरे अस्तित्व के पास आकर खड़ी हो गई।

“तुम्हें एक बात बताऊँ?” उसने धीमे स्वर में कहा।

अस्तित्व ने उसकी ओर देखा।

“जब प्रवासी ने पहली बार हमें देखा…”

“हाँ?”

“उस क्षण मुझे लगा जैसे वह किसी और को देख रहा हो।”

अस्तित्व ने पूछा

“किसे?”

साक्षी ने धीरे से कहा

“जैसे… वह हमें नहीं, हमारी किसी पुरानी छवि को देख रहा हो।”

यह वाक्य हवा में ठहर गया।

अस्तित्व के मन में अचानक एक विचार चमका।

“अगर ऐसा है…”

“तो?”

“तो संभव है कि वह केवल हमें नहीं पहचान रहा था…”

अस्तित्व ने धीरे से कहा

“…वह उस कहानी को पहचान रहा था जिसमें हम हैं।”

साक्षी ने उसे ध्यान से देखा।

उसकी आँखों में अब एक अलग-सी चमक थी।

“और अगर सच में ऐसा है,” उसने कहा,

“तो शाम को घाट पर लौटना बहुत ज़रूरी है।”

अस्तित्व ने सिर हिलाया।

दोपहर धीरे-धीरे ढलने लगी।

आकाश का रंग बदलने लगा था।

नदी दूर से अब हल्की चाँदी की तरह चमक रही थी।

अस्तित्व ने खिड़की से बाहर देखते हुए सोचा

सुबह उन्होंने केवल नदी को देखा था।

पर शाम को शायद

नदी उन्हें कुछ दिखाने वाली थी।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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