दिल की बे-तअल्लुक़ी का नूर
कभी-कभी
दिल को सबसे गहरी रौशनी
तअल्लुक़ से नहीं,
बे-तअल्लुक़ी से मिलती है।
जब इंसान
हर रिश्ते को पकड़ कर रखने की
बेचैनी छोड़ देता है
तब उसके अंदर
एक अजीब-सी रौशनी उतरती है।
वो रौशनी
शोर नहीं करती,
बस ख़ामोशी में
रूह को सुकून देती रहती है।
फिर मोहब्बत
मालिकाना हक़ नहीं बनती,
न ही किसी को
अपने पास रखने की जिद रह जाती है।
दिल बस इतना समझ जाता है
जो मेरी तक़दीर का उजाला है
वो मेरी राह में ठहर जाएगा,
और जो मेरी रूह का हिस्सा नहीं
वो किसी और आसमान का
सितारा होगा।
यही वह मुक़ाम है
जहाँ इंसान
तअल्लुक़ की गिरहों से निकल कर
ख़ामोश आज़ादी में साँस लेता है।
और तब
दिल की गहराइयों में
एक नर्म-सी रौशनी फैलती है
जिसे सूफ़ी
दिल की बे-तअल्लुक़ी का नूर कहते हैं।
मुकेश ,,,,,,
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