एक रात
मैंने सपना देखा
कि पूरी दुनिया के विद्यालय
अचानक संग्रहालयों में बदल गए हैं।
कक्षाओं में
कुर्सियाँ थीं,
ब्लैकबोर्ड थे,
सूखी हुई चॉक की धूल थी,
मगर बच्चे नहीं थे।
किताबें
अपना अर्थ खो चुकी थीं,
और परीक्षाएँ
खाली काग़ज़ों पर ली जा रही थीं।
लोग
डिग्रियों को सीने से लगाए
भटक रहे थे,
जैसे ज्ञान नहीं,
उसकी रसीदें बची हों।
अंत में
सिर्फ़ पाउलो फ़्रेरे बचा था।
वह
एक उजड़े हुए स्कूल के बरामदे में बैठा
धीरे-धीरे
मिट्टी पर कुछ लिख रहा था।
मैंने पास जाकर देखा —
वह बच्चों के नाम लिख रहा था
जो कभी
सवाल पूछना चाहते थे।
मैंने उससे पूछा —
“क्या शिक्षा समाप्त हो गई?”
फ़्रेरे ने
टूटी हुई खिड़की से बाहर देखते हुए कहा —
“शिक्षा
कभी किताबों में नहीं रहती।
वह उस क्षण जन्म लेती है
जब कोई मनुष्य
डरना छोड़कर
पहला प्रश्न पूछता है…”
इतना कहकर
उन्होंने मिट्टी पर लिखे नामों पर
धीरे से हाथ फेर दिया।
और अचानक
हवा चलने लगी।
सारे नाम
धीरे-धीरे मिट गए,
मगर धूल में
अब भी
कुछ अधूरे प्रश्न चमक रहे थे।
— मुकेश
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