एक दिन
बारिश हुई
और मेरी कविता के सारे शब्द भीग गए।
वे काग़ज़ पर वैसे नहीं रहे
जैसे पहले थे।
स्याही फैल गई,
कुछ वाक्य धुँधले पड़ गए,
कुछ शब्द
अपने अर्थ छोड़कर
नीचे बहने लगे।
“प्रेम”
धीरे-धीरे
“प्रतीक्षा” में बदल गया।
“घर” का एक कोना घुल गया,
और “माँ” शब्द के आसपास
हल्का-सा पानी जमा हो गया।
मैं देर तक
भीगे हुए पन्नों को देखता रहा
जैसे किसी दुर्घटना के बाद
मनुष्य
अपने ही चेहरे को पहचानने की कोशिश करता है।
लेकिन उस दिन
सिर्फ़ मेरी कविता नहीं भीगी थी।
पूरा शहर
भीतर तक भीग गया था।
पुरानी लाइब्रेरी की दीवारों में
नमी उतर आई थी,
और वर्षों से बन्द किताबों के भीतर
दबे हुए फूल
फिर से गन्ध छोड़ने लगे थे।
एक बूढ़ा डाकिया
बरसात में भीगता हुआ
गलत पते पर चिट्ठियाँ बाँटता रहा।
शायद उसे
अब ठीक-ठीक याद नहीं रहा था
कि कौन
किसका इंतज़ार कर रहा है।
बस-स्टैण्ड पर खड़ी लड़की के काजल में
पूरा बचपन बह रहा था।
एक आदमी
जिसने वर्षों से रोया नहीं था,
अचानक
सड़क किनारे रुक गया
और बहुत देर तक
बारिश को अपने चेहरे पर गिरने देता रहा।
कपड़ों की दुकानों में
रंग गहरे हो गए थे।
जूते कीचड़ से भर गए थे।
और अस्पताल की खिड़कियों पर
पानी की बूँदें
ऐसे चिपकी थीं
जैसे किसी ने
बहुत सारे अधूरे वाक्य
काँच पर लिख दिए हों।
उस दिन
पेड़ भी अलग तरह से भीगे थे।
उनकी शाखाओं से
सिर्फ़ पानी नहीं टपक रहा था,
पुराने मौसम गिर रहे थे।
गली के मोड़ पर बैठा कुत्ता
इतना भीग चुका था
कि वह कुत्ता नहीं,
बरसात का कोई विचार लग रहा था।
शाम तक
शहर की आवाज़ बदल गई।
रिक्शों की घंटियाँ नरम पड़ गईं,
लोग धीमे बोलने लगे,
और चाय की दुकानों पर उठती भाप में
एक अजीब उदासी घुल गई।
मैं घर लौटा
तो देखा
मेरी मेज़ पर रखी कविता अब भी भीगी हुई थी।
कुछ शब्द
पूरी तरह मिट चुके थे।
लेकिन अजीब बात —
जो शब्द बच गए थे,
वे पहले से अधिक सच्चे लग रहे थे।
जैसे बारिश ने
उनसे झूठ धो दिया हो।
उस रात
मैंने पहली बार समझा
कि कविताएँ
सूखे काग़ज़ पर नहीं लिखी जातीं।
वे लिखी जाती हैं
उन चीज़ों पर
जो भीतर ही भीतर
लगातार भीगती रहती हैं।
— मुकेश
No comments:
Post a Comment