एक पाठक ने कहा
“आपकी कहानियों में
बहुत कम घटनाएँ होती हैं।”
मैं मुस्कुरा दिया।
उसे कैसे समझाता
कि मनुष्य की सबसे बड़ी घटनाएँ
अक्सर बाहर नहीं घटतीं।
वे भीतर होती हैं —
इतनी चुपचाप
कि पास बैठा व्यक्ति भी
उन्हें सुन नहीं पाता।
एक आदमी
अचानक
अपने पिता जैसा बोलने लगता है।
एक स्त्री
बरसों बाद
किसी पुराने गीत से टूट जाती है।
कोई
भीड़ भरी सड़क पार करते हुए
अचानक महसूस करता है
कि अब वह पहले वाला व्यक्ति नहीं रहा।
ये छोटी बातें लगती हैं,
लेकिन यहीं
मनुष्य बदलता है।
युद्ध, दुर्घटनाएँ, प्रेम, बिछड़न
ये सब बाद की चीज़ें हैं।
असल घटना तो वह क्षण है
जब भीतर
कोई विश्वास चुपचाप मरता है,
या कोई नई संवेदना
पहली बार आँख खोलती है।
मैं उन्हीं क्षणों को लिखता हूँ।
इसलिए मेरी कहानियों में
कई बार
लोग सिर्फ़ बैठे रहते हैं,
खिड़की से बाहर देखते हैं,
चाय पीते हैं,
या देर तक कुछ नहीं कहते।
क्योंकि मनुष्य
सबसे अधिक
उसी समय घटित हो रहा होता है
जब बाहर से
कुछ भी घटता हुआ नहीं दिखता।
और शायद
जीवन भी
कोई तेज़ उपन्यास नहीं,
बल्कि एक धीमी-सी बारिश है
जो वर्षों तक
भीतर गिरती रहती है।
— मुकेश
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