मेरे शहर में
एक आदमी रहता था
जो टूटे हुए सपनों से
छतरियाँ बनाता था।
उसकी दुकान
रेलवे पुल के नीचे थी,
जहाँ हमेशा
थोड़ी-सी नमी रहती थी
और लोहे की गन्ध आती थी।
लोग उसके पास
पुराने सपने लेकर आते
किसी का सपना था
गायक बनने का,
जो अब सरकारी दफ़्तर में फाइलें ढो रहा था।
किसी ने
समुद्र देखने का सपना
तीन बच्चों और एक बीमार पिता के बीच
कहीं रखकर भूल दिया था।
एक औरत आई
जिसका सपना था
कि कोई उसे
उसके असली नाम से पुकारे।
वह आदमी
बहुत ध्यान से
उन सपनों को खोलता,
उनकी सिलाइयाँ देखता,
और फिर उनसे
छतरियाँ बनाने लगता।
अजीब बात थी —
उन छतरियों के नीचे
बारिश कम लगती थी।
जो लोग उन्हें लेकर चलते,
वे थोड़ा हल्का महसूस करते।
एक लड़के ने कहा
कि उस छतरी के नीचे
उसे पहली बार लगा
कि असफलता भी
पूरी तरह बदसूरत चीज़ नहीं होती।
धीरे-धीरे
पूरा शहर
उसी की छतरियों से भर गया।
सड़कों पर चलते लोग
ऊपर से सामान्य दिखते थे,
लेकिन उनके सिरों के ऊपर
किसी न किसी टूटे हुए सपने की परछाईं खुली रहती।
फिर एक साल
बारिश बिल्कुल नहीं हुई।
लोगों ने छतरियाँ खोलना बन्द कर दिया।
वे अलमारियों में पड़ी रहीं,
धीरे-धीरे धूल जमा करती हुईं।
लेकिन आश्चर्य
उस वर्ष
शहर में सबसे अधिक लोग बीमार पड़े।
डॉक्टरों ने कहा
हवा में कोई अजीब सूखापन है।
तब पहली बार
लोगों को समझ आया
कि मनुष्य
सिर्फ़ रोटी और पानी से नहीं बचता,
उसे थोड़ी-सी नमी
अपने टूटे हुए सपनों की भी चाहिए।
— मुकेश
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