एक रात
मेरे कमरे की सारी किताबें
धीरे-धीरे फुसफुसाने लगीं।
पहले
आवाज़ बहुत हल्की थी,
जैसे काग़ज़
नींद में करवट ले रहे हों।
फिर अचानक
पूरा कमरा
धीमी बातचीतों से भर गया।
पुरानी कविताओं की किताबें
सबसे उदास स्वर में बोल रही थीं।
उपन्यास
लम्बी साँसें लेते थे,
और शब्दकोश
बार-बार
अपने भीतर खोए हुए अर्थ खोजते रहते।
मैं बिस्तर पर बैठा
सुनता रहा।
एक किताब कह रही थी :
“मनुष्य अब
हमें पढ़ता कम है,
सजाता ज़्यादा है।”
दूसरी ने बहुत थकी आवाज़ में कहा :
“लोग अब
पूरा दुःख नहीं पढ़ पाते।
वे बीच में ही
मोबाइल देखने लगते हैं।”
एक बहुत पुरानी डायरी
लगातार काँप रही थी।
उसके पन्नों में
दबी हुई स्याही
जैसे अब भी
किसी का इंतज़ार कर रही थी।
अचानक
ऊपरी शेल्फ़ से
एक पतली-सी किताब नीचे गिरी।
उसके पन्ने खुल गए।
लेकिन उनमें
एक भी शब्द नहीं था।
सिर्फ़ खाली सफ़े।
मैंने उसे उठाया।
किताब गर्म थी,
जैसे अभी-अभी
किसी ने उसे पढ़ा हो।
मैंने कान लगाया।
अंदर से
बहुत धीमी आवाज़ आई :
“शब्द चले जाते हैं।
लेकिन जो सचमुच पढ़ लिया गया हो,
वह खालीपन बनकर रह जाता है।”
उस क्षण
कमरे की सारी फुसफुसाहट बन्द हो गई।
घड़ी की टिक-टिक लौट आई।
बाहर से
दूर जाती किसी मोटर की आवाज़ आई।
सब कुछ सामान्य था।
सिर्फ़ मेरी मेज़ पर
वह खाली किताब अब भी खुली पड़ी थी।
और अजीब बात
जितनी देर मैं उसे देखता रहा,
उतना ही
मुझे लगता गया
कि उसके सफ़ेद पन्नों पर
धीरे-धीरे
मेरा अपना जीवन उभर रहा है।
— मुकेश
No comments:
Post a Comment