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Thursday, 28 May 2026

धूप से मेरी गुफ़्तगू

 धूप से मेरी गुफ़्तगू

उस दिन हुई

जब दिल बहुत दिनों बाद

ख़ुद अपनी आवाज़ सुनना चाहता था।


सुबह अभी पूरी तरह जागी नहीं थी।

आसमान पर

फ़ज्र की नमाज़ के बाद वाली ख़ामोशी ठहरी थी।


मैं खिड़की के पास बैठा

हथेलियों में चाय की गर्मी लिये

दूर पेड़ों पर उतरती रौशनी देख रहा था।


तभी धूप आई।


न बहुत तेज़,

न चकाचौंध करती हुई।

बस ऐसे

जैसे कोई सूफ़ी दरवेश

लंबे सफ़र के बाद

थककर आँगन में बैठ जाए।


वह मेरे पास ठहरी

और बिना कुछ कहे

मेरे कमरे की उदासी पढ़ने लगी।


मैंने उससे पूछा 


“तुम्हें हर रोज़

इतने अँधेरों से गुज़रना पड़ता है,

डर नहीं लगता?”


धूप मुस्कुराई।


उसकी मुस्कान

पुरानी मस्जिद की सीढ़ियों पर

बिखरे कबूतरों जैसी थी।


वह बोली 


“अँधेरा मेरा दुश्मन नहीं,

वह तो बस

मेरे आने से पहले की ख़ामोशी है।”


मैं देर तक

उसकी बात सोचता रहा।


फिर मैंने पूछा 

“और इंसान?”


धूप कुछ पल

मेरी किताबों पर झुकी रही,

जैसे उनमें कोई भूला हुआ नाम ढूँढ रही हो।


फिर धीरे से बोली 


“इंसान मिट्टी से नहीं बनता,

वह यादों और प्रतीक्षाओं से बनता है।


उसके भीतर

एक पूरा आकाश रहता है,

मगर वह उम्र भर

अपने ही बंद कमरे में कैद रहता है।”


मैंने कहा 

“तो फिर सुकून कहाँ मिलता है?”


धूप ने

खिड़की से आती हवा में

अपनी उँगलियाँ डुबोईं

और बोली 


“जब आदमी

ख़ुद को साबित करना छोड़ देता है,

तब उसकी रूह

धीरे-धीरे हल्की होने लगती है।”


इतना कहकर

वह मेरे कंधे पर उतर आई।


उस पल

मुझे लगा

जैसे किसी ने भीतर जलते हुए

बहुत पुराने दुख पर

ठंडा पानी रख दिया हो।


और फिर

पूरा कमरा

रौशनी से नहीं,

एक अजीब-सी रहमत से भर गया।


मुकेश ,,,,,,,,,

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