राख में कोई आग दिखाई नहीं देती”
राख का एक मैदान है,
धूसर,
ठंडा,
जहाँ हवा भी
धीरे चलती है।
मैं वहाँ पहुँचा
तो लगा
यहाँ सब कुछ ख़त्म हो चुका है।
न कोई लपट,
न धुआँ,
न जलने की आवाज़—
सिर्फ़ बिखरी हुई राख
और एक अजीब ख़ामोशी।
मैंने झुककर
उसे हाथ में लिया,
वह बहुत हल्की थी,
जैसे किसी पुराने प्रेम की आख़िरी स्मृति।
तभी
उँगलियों के नीचे
हल्की-सी गर्मी महसूस हुई।
मैं चौंका।
जो बाहर से
पूरी तरह बुझा हुआ लगता है,
वह भीतर कहीं
अब भी जल रहा होता है।
फिर मुझे
अपने ही भीतर के कई हिस्से याद आए—
कुछ रिश्ते,
कुछ सपने,
कुछ अधूरी बातें
जिन्हें मैंने समय की राख में दबा दिया था।
दुनिया ने समझा
वे समाप्त हो गए,
पर सच यह था
कि वे सिर्फ़ दिखाई देना बंद हुए थे।
मैं देर तक
उस राख को देखता रहा।
और पहली बार समझ आया—
हर बुझी हुई चीज़
मृत नहीं होती,
कुछ आगें
लपटों से नहीं,
अंदर की तपिश से जीवित रहती हैं।
मुकेश',,,,,,,
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