एक दिन
मेरी किताब के सारे शब्द
हवा में उड़ने लगे।
पहले
मुझे लगा
यह सिर्फ़ थकान है,
या देर रात तक जागने का असर।
लेकिन फिर
मैंने साफ़ देखा —
एक-एक करके
शब्द पन्नों से उठ रहे थे।
बहुत हल्के,
जैसे किसी पुराने पेड़ से
सूखे पत्ते टूटते हैं।
“प्रेम”
सबसे पहले उड़ा।
वह कुछ देर
कमरे में चक्कर लगाता रहा,
फिर अचानक
एक अजीब-सी खुशबू में बदल गया।
कमरे में
भीगी मिट्टी,
पुरानी चिट्ठियों
और किसी भूले हुए आलिंगन की
मिली-जुली गन्ध भर गई।
“दुःख”
धीरे-धीरे खिड़की की ओर गया।
वहाँ से आती धूप में
वह घुलने लगा,
और कुछ क्षणों बाद
सिर्फ़ हल्की चमक बची।
ऐसा लगा
जैसे रोशनी भी
कभी-कभी
किसी टूटे हुए शब्द का दूसरा रूप होती है।
कुछ शब्द
बहुत बेचैन थे।
वे कमरे में
ऊपर-नीचे तैरते रहे,
जैसे उन्हें तय न हो
कि अर्थ में रहना है
या शून्य में।
“घर”
काफ़ी देर तक
पंखे के पास मंडराता रहा।
“माँ”
धीरे से मेज़ पर आ बैठा
और फिर
इतना हल्का हो गया
कि दिखाई देना बन्द हो गया।
“अकेलापन”
कमरे से बाहर चला गया।
मैंने उसे
गलियारे में,
सीढ़ियों पर,
यहाँ तक कि सड़क तक जाते देखा।
उसके पीछे
थोड़ी ठंडक छूटती जा रही थी।
कुछ शब्द
बहुत दूर उड़ गए।
इतने दूर
कि शायद अब
किसी दूसरे शहर,
दूसरी भाषा,
या किसी अजन्मे आदमी के सपनों में होंगे।
और कुछ का
कभी पता ही नहीं चला।
मैंने उन्हें बहुत खोजा।
पुरानी दराज़ों में,
तकियों के नीचे,
किताबों की जिल्दों में,
यहाँ तक कि
अपनी ही आवाज़ में।
लेकिन वे
जैसे दुनिया से नहीं,
अस्तित्व से गायब हो गए थे।
धीरे-धीरे
पूरा कमरा खाली हो गया।
पन्नों पर
अब सिर्फ़ सफ़ेदी बची थी।
एक भयावह,
निर्दोष,
शांत सफ़ेदी।
मैं उन खाली पन्नों को लिये
बहुत देर तक
वहीं बैठा रहा।
बाहर
शाम उतर रही थी।
खिड़की से आती हवा
अब भी
पन्नों को हिला रही थी,
जैसे उनमें
कुछ लिखा हो।
और तभी
मुझे पहली बार समझ में आया —
शब्द
कभी हमारे नहीं होते।
हम सिर्फ़ कुछ समय के लिए
उन्हें अपने भीतर ठहरने देते हैं।
फिर एक दिन
वे लौट जाते हैं
खुशबू बनकर,
रोशनी बनकर,
मौन बनकर,
या किसी ऐसी जगह
जहाँ तक
लेखक की पहुँच नहीं होती।
उस रात
मैंने किताब बन्द नहीं की।
मैं देर तक
उन खाली पन्नों को देखता रहा,
और अजीब बात —
जितने अधिक वे खाली होते जा रहे थे,
उतना ही
मुझे लग रहा था
कि उनमें
कुछ बहुत गहरा लिखा है।
— मुकेश
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