“ईशावास्यमिदं
सर्वम्” — अद्वैत, त्याग और आत्मैक्य का उपनिषद्-दर्शन
ईशावास्योपनिषद्
के प्रथम मन्त्र एवं शाङ्करभाष्य का दार्शनिक, तुलनात्मक और शोधपूर्ण अध्ययन
ईशावास्योपनिषद्
का प्रथम मन्त्र (मूल संस्कृत)
ईशावास्यमिदं
सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥ १॥
मन्त्र
का यथावत् हिन्दी अनुवाद
यह सम्पूर्ण जगत — जो कुछ भी
इस चलायमान संसार में है — सब
ईश्वर से आवृत है।
अतः त्यागपूर्वक उसका उपभोग करो;
किसी के धन की
इच्छा मत करो, क्योंकि
यह धन वास्तव में
किसका है?
शङ्करभाष्य
का हिन्दी अनुवाद (यथारूप)
“ईशा”
शब्द “ईश” धातु से
बना है, जिसका अर्थ
है — शासन करने वाला।
अर्थात् यहाँ “ईश” से अभिप्राय
परमेश्वर, परमात्मा है, जो सबका
नियन्ता है।
वह सब प्राणियों के
भीतर अन्तर्यामी आत्मा के रूप में
स्थित होकर सबका संचालन
करता है।
अतः अपने वास्तविक आत्मस्वरूप
परमात्मा से इस सम्पूर्ण
जगत को आच्छादित करना
चाहिए।
क्या
आच्छादित करना चाहिए?
यह सम्पूर्ण जगत — जो कुछ भी
इस पृथ्वी पर चलायमान है
— सबको इस भाव से
देखना चाहिए कि “मैं ही
यह सम्पूर्ण जगत हूँ”; अर्थात्
परमार्थ सत्यस्वरूप आत्मा से इस मिथ्या
चराचर जगत को आवृत
करना चाहिए।
जैसे
चन्दन में जल आदि
के संसर्ग से उत्पन्न दुर्गन्ध,
उसके वास्तविक सुगन्धस्वरूप के प्रकट होने
पर ढँक जाती है;
उसी प्रकार आत्मा पर आरोपित कर्तृत्व,
भोक्तृत्व तथा द्वैतमय जगत
का अज्ञानजनित स्वरूप आत्मभावना से नष्ट हो
जाता है।
यह सम्पूर्ण नाम, रूप और
कर्ममय विकार-समूह आत्मा के
परमार्थ सत्यस्वरूप के ज्ञान से
तिरोहित हो जाता है।
इस प्रकार जो पुरुष ईश्वरात्मभावना
से युक्त हो जाता है,
उसके लिए पुत्रेषणा, वित्तेषणा
और लोकेषणा — इन तीनों एषणाओं
का संन्यास ही उचित है;
कर्मों में उसका अधिकार
नहीं रहता।
“तेन
त्यक्तेन” — अर्थात् त्याग द्वारा।
क्योंकि
त्यक्त पुत्र या सेवक आत्मसम्बन्ध
के अभाव से आत्मा
की रक्षा नहीं करता; अतः
यहाँ त्याग ही वेद का
अभिप्राय है।
“भुञ्जीथाः”
का अर्थ है — अपने
आत्मस्वरूप की रक्षा करो।
इस प्रकार एषणात्रय से रहित होकर
धन की इच्छा मत
करो।
किसी दूसरे के धन की
आकांक्षा मत करो।
“कस्य
स्वित् धनम्” — वास्तव में किसी का
धन है ही नहीं;
क्योंकि आत्मा ही यह सब
है।
जब सब आत्मस्वरूप ही
है, तब मिथ्या विषयों
में लोभ क्यों किया
जाए?
ईशावास्योपनिषद्
का दार्शनिक महत्त्व
ईशावास्योपनिषद्
शुक्ल यजुर्वेद के वाजसनेयी संहिता
के चालीसवें अध्याय में स्थित अत्यन्त
संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त गम्भीर उपनिषद् है। इसमें केवल
अठारह मन्त्र हैं, परन्तु सम्पूर्ण
वेदान्त का सार इनमें
समाहित है।
प्रथम
मन्त्र ही सम्पूर्ण उपनिषद्
का बीज है।
इसमें तीन मूल तत्त्व
निहित हैं—
- ईश्वरव्याप्ति — “ईशावास्यमिदं सर्वम्”
- त्याग — “तेन त्यक्तेन”
- अलोभ एवं अनासक्ति — “मा गृधः”
शङ्कराचार्य
इस मन्त्र को अद्वैत वेदान्त
का प्रतिपादक मानते हैं। उनके अनुसार
जगत् का वास्तविक स्वरूप
आत्मा ही है; नाम-रूपात्मक भेद केवल अविद्याजन्य
अध्यास हैं।
“ईशावास्यमिदं
सर्वम्” : अद्वैत का महावाक्य
शङ्कराचार्य
के अनुसार यहाँ “वास्यम्” का अर्थ केवल
“ईश्वर से ढका हुआ”
नहीं है, बल्कि “ईश्वरस्वरूप
से आच्छादित जानना” है।
अर्थात्
जगत को पृथक् सत्ता
मानना अज्ञान है।
ज्ञान यह है—
“अहमेवेदं
सर्वम्”
— मैं ही यह सम्पूर्ण
जगत हूँ।
यहाँ
उपनिषद् बाह्य ईश्वरवाद से आगे जाकर
आत्मा और ब्रह्म की
एकता की घोषणा करता
है।
अध्यास
और जगत् की मिथ्यात्व-व्याख्या
शङ्कराचार्य
का समस्त दर्शन “अध्यास” पर आधारित है।
आत्मा
स्वयं शुद्ध, निरुपाधिक, असंग और चैतन्यमात्र
है; किन्तु अज्ञान से उसमें— कर्तृत्व ,भोक्तृत्व,सुख-दुःख, देहाभिमान, जगत्-भेद ,का आरोप
हो जाता है।
चन्दन-दृष्टान्त अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
जैसे चन्दन पर आई दुर्गन्ध
उसकी वास्तविक सुगन्ध नहीं है, वैसे
ही संसारात्मक द्वैत आत्मा का वास्तविक स्वरूप
नहीं है।
ज्ञान
होने पर मिथ्यात्व नष्ट
हो जाता है।
“तेन
त्यक्तेन भुञ्जीथा” : त्याग का वास्तविक अर्थ
सामान्य
अर्थ में त्याग का
अर्थ वस्तुओं को छोड़ देना
समझा जाता है, किन्तु
शङ्कराचार्य के अनुसार यहाँ
त्याग का अर्थ है—
- अहंता का त्याग
- ममता का त्याग
- विषयासक्ति का त्याग
- एषणात्रय का संन्यास
एषणात्रय
- पुत्रेषणा
- वित्तेषणा
- लोकेषणा
जब आत्मा ही सर्वस्व है,
तब बाह्य वस्तुओं में आसक्ति अज्ञानमात्र
है।
“मा गृधः” : उपनिषद् का नैतिक आयाम
यह मन्त्र केवल आध्यात्मिक सिद्धान्त
नहीं देता, बल्कि नैतिक जीवन का आधार
भी प्रस्तुत करता है।
यदि
सबमें वही आत्मा है,
तो—
- हिंसा का औचित्य नहीं,
- शोषण का औचित्य नहीं,
- लोभ का औचित्य नहीं।
यहाँ
वेदान्त सामाजिक नैतिकता का भी आधार
बनता है।
भारतीय
दर्शनों से तुलनात्मक अध्ययन
(क)
अद्वैत वेदान्त
शङ्कर
के अनुसार—
- ब्रह्म सत्य है
- जगत मिथ्या है
- जीव और ब्रह्म अभिन्न हैं
यह मन्त्र अद्वैत का प्रत्यक्ष प्रतिपादक
माना गया है।
(ख)
विशिष्टाद्वैत वेदान्त
Ramanujacharya के
अनुसार जगत मिथ्या नहीं
है।
जगत और जीव ब्रह्म
के शरीर हैं।
अतः
“ईशावास्यमिदं सर्वम्” का अर्थ होगा—
सम्पूर्ण
जगत ईश्वर से व्याप्त है
क्योंकि वह उसका शरीर
है।
यहाँ
भेदाभेद स्वीकार है, पूर्ण अभेद
नहीं।
(ग)
द्वैत वेदान्त
Madhvacharya के
अनुसार—
- जीव और ईश्वर सदा भिन्न हैं।
- जगत वास्तविक है।
- ईश्वर सर्वव्यापक है, परन्तु जीव उससे भिन्न सत्ता है।
अतः
वे इस मन्त्र को
ईश्वर की सर्वाधिकारिता के
रूप में ग्रहण करते
हैं, आत्मैक्य के रूप में
नहीं।
(घ)
त्रैतवाद
Swami Dayananda Saraswati के
त्रैतवाद में—
- ईश्वर
- जीव
- प्रकृति
तीनों
अनादि और भिन्न माने
जाते हैं।
इस दृष्टि से “ईशावास्यम्” का
अर्थ है—
ईश्वर का शासन सम्पूर्ण
जगत पर है; किन्तु
जगत और जीव ईश्वर
नहीं हैं।
(ङ)
सांख्य दर्शन
Kapila का
सांख्य पुरुष और प्रकृति को
भिन्न मानता है।
यहाँ अद्वैत की तरह पूर्ण
अभेद नहीं है।
किन्तु
वैराग्य और आसक्ति-त्याग
की शिक्षा सांख्य से मिलती-जुलती
है।
(च)
बौद्ध दर्शन
विशेषतः
माध्यमिक बौद्धमत में जगत की
शून्यता का विचार अद्वैत
के मिथ्यात्व से कुछ साम्य
रखता है।
किन्तु
अन्तर यह है—
- अद्वैत में आत्मा परम सत्य है,
- बौद्ध में अनात्मवाद प्रधान है।
१०.
पश्चिमी दार्शनिकों से तुलनात्मक अध्ययन
(क)
Baruch Spinoza
स्पिनोज़ा
ने कहा—
“God or Nature”
उनके
अनुसार सम्पूर्ण अस्तित्व एक ही अनन्त
सत्ता का विस्तार है।
यह विचार “ईशावास्यमिदं सर्वम्” से अत्यन्त निकट
प्रतीत होता है।
किन्तु
शङ्कर का ब्रह्म चैतन्यमय
है, जबकि स्पिनोज़ा का
substance दार्शनिक सत्ता है।
(ख)
Georg Wilhelm Friedrich Hegel
हेगेल
का “Absolute Spirit” सम्पूर्ण विश्व-प्रक्रिया में स्वयं को
प्रकट करता है।
यह अद्वैत के ब्रह्म-विचार
से कुछ साम्य रखता
है, किन्तु हेगेल में इतिहास और
विकास वास्तविक हैं; शङ्कर में
जगत मिथ्या है।
(ग)
Arthur Schopenhauer
शोपेनहावर
उपनिषदों से अत्यधिक प्रभावित
थे।
उन्होंने उपनिषदों को मानवता का
महानतम ज्ञान कहा।
उनकी
“Will” की संकल्पना दुःखमय संसार की व्याख्या करती
है, और वैराग्य का
मार्ग प्रस्तुत करती है — जो
“तेन त्यक्तेन” के निकट है।
(घ)
Edmund Husserl और
Phenomenology
हुस्सेरल
ने “Pure
Consciousness” अथवा
“Transcendental Ego” की
चर्चा की।
उनकी
“Phenomenological Reduction” बाह्य
जगत के स्थूल अनुभवों
को निलम्बित कर शुद्ध चेतना
तक पहुँचने का प्रयास है।
यह अद्वैत की “दृग्दृष्टि” और
“साक्षीचैतन्य” की अवधारणा से
तुलनीय है।
(ङ)
Martin Heidegger
हाइडेगर
का “Being” का प्रश्न भी
अस्तित्व की मूल सत्ता
की खोज है।
किन्तु
वेदान्त जहाँ ब्रह्म को
चैतन्य कहता है, वहीं
हाइडेगर Being को अनिर्वचनीय अस्तित्व-प्रक्रिया के रूप में
देखते हैं।
ईशावास्योपनिषद्
का सामाजिक और आध्यात्मिक सन्देश
यह मन्त्र केवल संन्यासियों के
लिए नहीं है।
यह सिखाता है—
- उपभोग करो, परन्तु आसक्ति से नहीं।
- धन रखो, परन्तु लोभ से नहीं।
- संसार में रहो, परन्तु आत्मा को विस्मृत मत करो।
यह
“त्यागपूर्ण भोग” का दर्शन
है।
निष्कर्ष
ईशावास्योपनिषद्
का प्रथम मन्त्र सम्पूर्ण वेदान्त का हृदय है।
शङ्कराचार्य ने इसे अद्वैत
के परम घोषवाक्य के
रूप में प्रस्तुत किया
है।
“ईशावास्यमिदं
सर्वम्” केवल दार्शनिक सिद्धान्त
नहीं, बल्कि चेतना की क्रान्ति है।
जब साधक यह अनुभव
करता है कि—
“आत्मैवेदं
सर्वम्”
तब—
- लोभ समाप्त हो जाता है,
- भय समाप्त हो जाता है,
- द्वेष समाप्त हो जाता है,
- और मनुष्य ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है।
इस प्रकार यह मन्त्र मानवता
को एक ऐसे दर्शन
की ओर ले जाता
है जहाँ आध्यात्मिकता, नैतिकता,
त्याग और सार्वभौमिक एकता
एक ही सत्य के
विविध आयाम बन जाते
हैं।
No comments:
Post a Comment