सन् 2084 में
दुनिया की सभी घड़ियाँ
एक साथ
सिर्फ़ तीन मिनट के लिए रुक गईं।
कोई नहीं जानता
यह कैसे हुआ।
न परमाणु युद्ध,
न सौर तूफ़ान,
न किसी हैकर का हमला।
बस अचानक —
टिक-टिक बन्द।
ट्रेनें चलती रहीं,
हवाई जहाज़ हवा में रहे,
लोग बोलते रहे,
लेकिन समय
मानो अपनी कुर्सी छोड़कर
कहीं चला गया हो।
पहले मिनट में
लोगों ने घबराकर
मोबाइल देखे।
दूसरे मिनट में
कुछ अजीब होने लगा।
एक आदमी
जो वर्षों से
अपने भाई से बात नहीं कर रहा था,
अचानक रो पड़ा।
एक स्त्री
ऑपरेशन थिएटर में
अपने मृत बेटे का चेहरा देखने लगी।
जेलों में बन्द कैदियों को
अपने बचपन की गन्ध आने लगी।
और दुनिया भर के होटल कमरों में
सो रहे लोग
एक ही सपना देखने लगे :
एक विशाल मैदान,
जहाँ कोई आवाज़ नहीं थी,
सिर्फ़ हवा
और दूर खड़ा
एक दरवाज़ा।
तीसरे मिनट तक
स्थिति और विचित्र हो गई।
कुछ लोगों ने दावा किया
कि उन्होंने
अपने शरीर के बाहर से
खुद को देखा।
कुछ ने कहा
कि उन्हें पहली बार
समझ में आया
कि वे वास्तव में किससे प्रेम करते हैं।
और कुछ इतने भयभीत हुए
कि समय लौटने के बाद भी
उन्होंने घड़ियाँ पहनना छोड़ दिया।
फिर अचानक
सब कुछ सामान्य हो गया।
टिक-टिक वापस।
रेलें समय पर।
समाचार चैनल सक्रिय।
सरकारों ने बयान जारी किए।
वैज्ञानिकों ने सम्मेलन किए।
धर्मगुरुओं ने भविष्यवाणियाँ।
लेकिन असली परिवर्तन
चुपचाप हुआ।
उस घटना के बाद
पूरी दुनिया में
लोगों ने
धीरे बोलना शुरू कर दिया।
तलाक कम हुए।
आत्महत्याएँ कुछ घट गईं।
और रात के तीन बजे
बहुत से लोग
अचानक उठकर
खिड़की के बाहर देखने लगे।
जैसे उन्हें
अब भी इंतज़ार हो
कि समय
कभी भी फिर से
अपनी कुर्सी छोड़ सकता है।
— मुकेश
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