एक वैज्ञानिक ने दावा किया
कि उसने
मनुष्य की आत्मा का वज़न माप लिया है।
पूरे शहर में हलचल मच गई।
लोग लाइन लगाकर
उसकी प्रयोगशाला पहुँचने लगे।
दरवाज़े पर लिखा था :
“कृपया भीतर प्रवेश करने से पहले
अपना अहंकार बाहर उतार दें।”
अंदर
एक बहुत संवेदनशील तराज़ू रखा था।
इतना संवेदनशील
कि उस पर
एक स्मृति रखने से भी
सुई काँपने लगती थी।
वैज्ञानिक
लोगों को कुर्सी पर बैठाता,
उनसे कहता
आँखें बन्द करें
और अपने जीवन का
सबसे सच्चा दुख याद करें।
कुछ देर बाद
तराज़ू हल्का-सा हिलता।
“देखिए,”
वह उत्साहित होकर कहता,
“आत्मा सक्रिय हो गई है।”
एक आदमी बैठा
और उसने
अपने पिता की मृत्यु याद की।
तराज़ू बहुत भारी हो गया।
एक स्त्री बैठी
और उसे
अपना पहला प्रेम याद आया।
तराज़ू अचानक हल्का हो गया,
जैसे कोई पक्षी
उड़ने से ठीक पहले होता है।
लेकिन समस्या तब शुरू हुई
जब वैज्ञानिक ने
खुद को तौलना चाहा।
वह कुर्सी पर बैठा,
आँखें बन्द कीं,
और बहुत देर तक
कुछ नहीं हुआ।
तराज़ू स्थिर रहा।
पहली बार
उसे डर लगा।
उसे समझ नहीं आया
कि उसके भीतर
आत्मा नहीं बची
या वह
इतने वर्षों से
सिर्फ़ दूसरों को मापता रहा
कि खुद को महसूस करना भूल गया।
उस रात
प्रयोगशाला की सारी मशीनें
अपने-आप बन्द हो गईं।
और अगली सुबह
तराज़ू पर
सिर्फ़ एक चीज़ मिली
एक बहुत हल्का आँसू,
जिसका वज़न
किसी इकाई में दर्ज नहीं किया जा सका।
— मुकेश
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