एक पाठक ने मुझसे पूछा —
“आप अपनी कहानियों में
पात्रों के नाम क्यों नहीं लिखते?”
मैं कुछ देर चुप रहा।
कैसे बताता उसे
कि नाम देते ही
दुःख छोटा हो जाता है।
वह किसी एक आदमी का दुःख बन जाता है,
किसी एक स्त्री की प्रतीक्षा,
किसी एक घर की चुप्पी।
जबकि मैंने जो दुःख देखे हैं,
वे इतने व्यक्तिगत नहीं थे।
वे बस दुःख थे।
बारिश की तरह
जो यह नहीं चुनती
कि किस छत पर गिरेगी।
मैंने स्टेशन पर रोते हुए लोगों को देखा है,
अस्पतालों में
धीरे-धीरे बुझती आँखें देखी हैं,
रात के आख़िरी पहर
खाली रसोई में बैठे आदमी देखे हैं।
उन सबके चेहरे अलग थे,
लेकिन भीतर की थकान
लगभग एक जैसी।
इसलिए
मैं नाम हटा देता हूँ।
ताकि कहानी
किसी एक की न रह जाए।
ताकि पढ़ते समय
हर आदमी को लगे —
“यह थोड़ा-सा मेरे बारे में भी है।”
सुख के साथ भी
कुछ ऐसा ही है।
एक बच्चा
बरसात में भीगकर हँसता है,
एक बूढ़ी स्त्री
सर्दियों की धूप में बैठी चुप रहती है,
कोई प्रेम में
पहली बार अपना नाम
दूसरे की आवाज़ में सुनता है।
ये सुख
किसी एक के नहीं होते।
वे मनुष्य के पुराने अनुभव हैं,
जो बार-बार
अलग शरीरों में जन्म लेते रहते हैं।
इसलिए
मेरी कहानियों में
कई बार कोई पात्र नहीं होता।
सिर्फ़ एक कमरा होता है,
एक मौसम,
एक आवाज़,
एक प्रतीक्षा,
या भीतर लगातार गिरती हुई
कोई अदृश्य चीज़।
धीरे-धीरे
भाव ही पात्र बन जाते हैं।
और शायद
साहित्य का सबसे सच्चा क्षण वही है
जब मनुष्य
अपना नाम भूलकर भी
अपने को पहचान लेता है।
— मुकेश
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