होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Sunday, 24 May 2026

जब पृथ्वी पर आख़िरी दर्ज़ी मरा,

 जब पृथ्वी पर

आख़िरी दर्ज़ी मरा,

उस दिन
कई देशों के झंडे
धीरे-धीरे उधड़ने लगे।

लोगों ने पहले ध्यान नहीं दिया।

उन्हें लगा
यह सिर्फ़ कपड़े का घिस जाना है।

लेकिन कुछ ही महीनों में
सीमाओं के किनारे से धागे निकलने लगे,
राष्ट्रगान गाते समय
लोग शब्द भूलने लगे,
और सैनिकों की वर्दियों पर
सिले हुए चिन्ह
रातों-रात गायब होने लगे।

संयुक्त राष्ट्र ने
आपात बैठक बुलाई।

वैज्ञानिकों ने कहा :
“यह राजनीतिक समस्या नहीं है।”

इतिहासकार बोले :
“सभ्यताएँ पहले भी टूटती रही हैं।”

लेकिन एक बहुत बूढ़ी स्त्री,
जो जीवन भर
कपड़े रफ़ू करती रही थी,
धीरे से बोली :

“नहीं।
दुनिया से सिलाई की कला खत्म हो रही है।”

उसकी बात पर
लोग हँसे।

लेकिन उसी रात
पूरी दुनिया में
अजीब घटनाएँ शुरू हो गईं।

टूटे हुए रिश्ते
अब वापस नहीं जुड़ते थे।

माफ़ियाँ
घावों पर टिकती नहीं थीं।

माएँ
बच्चों के फटे कपड़े तो सी देतीं,
लेकिन उनके डर नहीं।

प्रेमी
एक-दूसरे को छूते,
और उनके बीच
बहुत महीन दरारें महसूस होतीं।

यहाँ तक कि
भाषाएँ भी उधड़ने लगीं।

कविताओं से
क्रियाएँ गिरने लगीं,
प्रार्थनाओं से विश्वास,
और भाषणों से अर्थ।

दुनिया
धीरे-धीरे
एक ऐसे कपड़े में बदल रही थी
जिसकी बुनावट खुलती जा रही हो।

तब लोगों ने
दर्ज़ियों को खोजने की कोशिश की।

लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

आख़िरी दर्ज़ी
पहले ही मर चुका था,
और अपने साथ
वह यह रहस्य भी ले गया था
कि दो टूटती हुई चीज़ों को
धैर्य से
फिर से कैसे जोड़ा जाता है।

अब
रातों में
पूरा ग्रह
हल्की-हल्की चरमराहट करता है।

जैसे ब्रह्मांड के अँधेरे में
कहीं कोई पुराना वस्त्र
धीरे-धीरे फट रहा हो।

— मुकेश

No comments:

Post a Comment