शहर में
एक विभाग था
जो अनुपस्थित चीज़ों की देखभाल करता था।
वहाँ उन वस्तुओं का हिसाब रखा जाता
जो अचानक गायब हो गई थीं —
बचपन की एक सीटी,
दादी की हँसी,
किसी का असली हस्ताक्षर,
बरसात के बाद मिट्टी की पुरानी गन्ध,
या वह शब्द
जो जीभ तक आकर
हर बार लौट जाता है।
दफ्तर बहुत शांत था।
कर्मचारी धीरे बोलते थे,
क्योंकि ज़ोर से बोलने पर
कुछ स्मृतियाँ टूट जाती थीं।
फाइलों पर अजीब नाम लिखे रहते :
“एक आदमी का खोया हुआ साहस”
“सन 1998 की अधूरी दोपहर”
“रेलवे प्लेटफॉर्म पर छूटा आलिंगन”
लोग वहाँ आवेदन देने आते।
“मेरा पुराना विश्वास कहीं खो गया है…”
“मुझे अपनी माँ की आवाज़ ठीक से याद नहीं रही…”
“मैं हँसता हूँ,
लेकिन असली खुशी शायद कहीं रह गई…”
अधिकारी सिर हिलाते,
अलमारियाँ खोलते,
धूल भरे रजिस्टर पलटते।
कभी-कभी
उन्हें कोई चीज़ मिल भी जाती।
तब वे उसे
बहुत सावधानी से
मालिक को लौटा देते —
एक गन्ध,
एक धुन,
एक स्पर्श,
या अचानक आँखों में भर आया पानी।
लेकिन कुछ चीज़ें
“स्थायी रूप से अनुपस्थित” घोषित थीं।
जैसे :
पहला प्रेम,
बिना डर की नींद,
और वह चेहरा
जो हम आईने में
बचपन में देखा करते थे।
दफ्तर के सबसे भीतर
एक बन्द कमरा था।
कहा जाता था
वहाँ उन चीज़ों को रखा गया है
जिन्हें खोने के बाद
मनुष्य कभी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाता।
उस कमरे की चाबी
किसी के पास नहीं थी।
फिर भी
हर रात
अंदर से
बहुत धीमी हँसी सुनाई देती थी।
— मुकेश
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