शहरों में
लोग नहीं चलते
परछाइयाँ चलती हैं
और ये परछाइयाँ भी
अब थकने लगी हैं
काँच की इमारतों के बीच
सूरज नहीं टूटता
बस रोशनी
बहीखातों में दर्ज हो जाती है
यहाँ हर मुस्कान
एक अनुबंध है
और हर मुलाक़ात
एक तयशुदा समय का
छोटा-सा सौदा
लिफ़्टों में
ऊपर जाते हुए लोग
अंदर ही अंदर
नीचे उतरते रहते हैं
किसी पार्क में
एक बूढ़ा पेड़
अब भी याद करता है
कि कभी यहाँ
सिर्फ़ हवा चलती थी
और लोग रुक जाते थे
अब हवा भी
वाइफ़ाई जैसी हो गई है
दिखती नहीं
पर हर चीज़ को जोड़ती भी नहीं
और शहर
धीरे-धीरे यह सीख गया है
कि यहाँ चलना ज़रूरी नहीं
बस चलते रहने का
दिखावा करना पड़ता है
मुकेश ,,,,,
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