शहर के बीचोंबीच
एक आदमी
किराए पर चुप्पियाँ देता था।
उसकी छोटी-सी दुकान में
लकड़ी की अलमारियों पर
काँच की बोतलें सजी रहतीं।
हर बोतल में
अलग तरह की चुप्पी भरी थी।
“यह वाली
बारिश के बाद की है,”
वह धीरे से कहता।
“और यह
दो प्रेमियों के बीच
झगड़े के तुरन्त बाद वाली।”
कुछ चुप्पियाँ
बहुत हल्की थीं,
उन्हें खोलते ही
कमरे में नींद उतर आती।
कुछ इतनी भारी
कि लोग पाँच मिनट बाद ही
उन्हें वापस कर जाते।
सबसे महँगी चुप्पी
वह थी
जिसमें किसी मृत व्यक्ति की
अनुपस्थिति मिली हुई थी।
एक दिन
एक युवा लड़का आया।
उसने कहा :
“मुझे ऐसी चुप्पी चाहिए
जिसमें मैं
अपनी असफलताओं की आवाज़
न सुन सकूँ।”
दुकानदार बहुत देर सोचता रहा।
फिर उसने
ऊपरी शेल्फ़ से
धूल भरी बोतल उतारी।
“सावधानी से खोलना,”
उसने कहा,
“इसमें पहाड़ों की पुरानी बर्फ़ मिली है।”
लड़का बोतल लेकर चला गया।
लेकिन उसी रात
पूरा शहर असामान्य रूप से शांत हो गया।
कुत्ते नहीं भौंके।
रेल की आवाज़ नहीं आई।
यहाँ तक कि
घड़ियों की टिक-टिक भी
धीमी पड़ गई।
लोग घबराकर उठ बैठे।
उन्हें पहली बार एहसास हुआ
कि मनुष्य
आवाज़ों से नहीं,
अपनी-अपनी चुप्पियों से बना है।
और जब बहुत सारी चुप्पियाँ
एक साथ खुल जाती हैं,
तो दुनिया
थोड़ी देर के लिए
अपने बारे में सोचना शुरू कर देती है।
— मुकेश
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