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Sunday, 24 May 2026

एक रात हवा इतनी तेज़ चली

 एक रात

हवा इतनी तेज़ चली
कि घर में रखी पुरानी यादें
अपनी जगहों से गिरने लगीं।

सबसे पहले
दीवार पर टँगी तस्वीर गिरी।

काँच टूट गया,
और उसके भीतर मुस्कुराते लोग
अचानक बहुत उदास दिखाई देने लगे।

फिर अलमारी खुली।

ऊपर रखा लोहे का बक्सा
धीरे-धीरे खिसककर नीचे आया,
जैसे वर्षों से बन्द कोई बात
अब और चुप नहीं रहना चाहती।

मैंने बक्सा खोला।

अंदर
कुछ पीले पड़ चुके खत थे,
एक पुराना टिकट,
थोड़ी सूखी हुई गुलाब की पंखुड़ियाँ,
और एक रूमाल
जिसमें अब भी
बहुत हल्की-सी इत्र की गन्ध बची थी।

बाहर
आँधी चलती रही।

बिजली के तार
ऐसे काँप रहे थे
जैसे शहर की नसों में
बहुत पुराना डर दौड़ रहा हो।

सड़क पर लगे पेड़
बार-बार झुकते,
फिर अपने-आपको सँभाल लेते।

मनुष्य भी शायद
इसी तरह जीवित रहता है।

पूरी तरह टूटे बिना
बार-बार झुकते हुए।

रात के लगभग बारह बजे
अचानक बिजली चली गई।

घर अँधेरे में डूब गया।

और उसी क्षण
मुझे साफ़ सुनाई देने लगीं
वे आवाज़ें
जो रोशनी में कभी नहीं सुनाई देतीं 

लकड़ी का धीमे-धीमे सिकुड़ना,
पुरानी घड़ी का थका हुआ चलना,
अपनी ही साँस का अकेलापन।

मैं मोमबत्ती जलाकर बैठा रहा।

उसकी लौ में
कमरा वैसा नहीं लग रहा था
जैसा दिन में दिखता है।

हर वस्तु
अपना दूसरा चेहरा पहने थी।

कुर्सी
किसी प्रतीक्षा जैसी लग रही थी,
दरवाज़ा
किसी अधूरी यात्रा जैसा,
और आईना
एक ऐसा जल
जिसमें कोई उतरने से डरता हो।

सुबह जब हवा रुकी
तो शहर थोड़ा बदला हुआ था।

कई पेड़ टूट चुके थे।
कुछ छतें उड़ गई थीं।
और लोग
अपने-अपने घरों के सामने खड़े
हानि का हिसाब लगा रहे थे।

लेकिन सबसे ज़्यादा नुकसान
शायद उन चीज़ों का हुआ था
जिन्हें कोई सूची में दर्ज नहीं करता 

विश्वास,
पुरानी निश्चितताएँ,
और यह भ्रम
कि सब कुछ हमेशा अपनी जगह बना रहेगा।

— मुकेश

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