“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
कोहरे का धर्मग्रंथ
कोहरे का अपना
एक धर्मग्रंथ है।
उसमें लिखा है
जो स्पष्ट दिखाई दे,
उस पर विश्वास मत करो।
वृक्ष को वृक्ष से अधिक समझो।
मनुष्य को मनुष्य से कम।
और प्रेम को
कभी परिभाषित मत करो,
क्योंकि परिभाषा
हर रहस्य की मृत्यु है।
मुकेश ,,,,,,,
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