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Tuesday, 31 March 2026

एक "माँ" बेटी की विदाई के बाद

 एक "माँ" बेटी  की विदाई के बाद 


जब तक

किसी रसोई की आँच पर

एक माँ

बेटी की विदाई के बाद भी

दो कप चाय रख देती है—

तब तक

ममता पूरी तरह विदा नहीं होती दोस्तों!


वह माँ

जिसके हाथों की महक

बेटी के बालों में बसती थी,

जिसकी डाँट में भी

मीठी-सी छाँव होती थी—


अब

उसी रसोई में

थोड़ा धीमे चलती है।


उसकी अलमारी में

एक कोना वैसा ही है—

जहाँ बेटी के कपड़े

अब भी तह करके रखे हैं,


कभी

उन्हें खोलकर देखती है,

सूँघती है हल्का-सा,

और फिर

चुपचाप

वापस रख देती है।


सुबह उठकर

पहले की तरह आवाज़ लगाती है—

"उठ जा… देर हो जाएगी!"


फिर

खुद ही ठहर जाती है—

और समझ जाती है

कि अब

कोई नहीं उठेगा उस आवाज़ से।


फोन पर बात होती है—

"खाना खाया?"

"ससुराल में सब ठीक?"


हर सवाल में

चिंता कम

और आदत ज़्यादा होती है—


और "हाँ माँ" सुनकर

वह

अपने आँचल से

दिल की धड़कन ढँक लेती है।


वह माँ

जो पहले

बेटी के साथ

हर छोटी बात बाँटती थी—


अब

अपनी ही बातों को

अंदर रख लेती है,

जैसे

खुद ही अपनी सहेली बन गई हो।


रसोई में

कभी वही पकवान बनाती है

जो बेटी को पसंद थे—


फिर

थाली में परोसते हुए

एक पल को रुक जाती है—

और

थोड़ा-सा

नमक बढ़ जाता है।


घर में

सब कुछ है—

दीवारें, सामान, लोग—


बस

एक आवाज़ की कमी है

जो

हर कोने को

घर बनाती थी।


कभी

बेटी की पुरानी चोटी

या रिबन हाथ लग जाए—

तो वह

थोड़ी देर के लिए

वक्त को उल्टा जी लेती है—


फिर

धीरे-धीरे

वर्तमान में लौट आती है।


मैंने एक दिन पूछा—

"कैसा लग रहा है?"


वह मुस्कुराई—

"अच्छा है…

बेटी अपने घर में खुश है…"


और इस "अच्छा है" में

इतना गहरा खालीपन था

कि शब्द भी

थोड़ा ठहर गए।


मैं जानता हूँ

यह कविता

उस तक पहुँचेगी—

वह पढ़ेगी,

आँखों पर पल्लू रखेगी,

और कहेगी—


"सब माँओं की यही कहानी है…"


जाने क्यों मन करता है—

हर उस इंसान के सामने

इस माँ को खड़ा कर दूँ—

और कहूँ—


देखो!

यह स्त्री

अपना एक हिस्सा

खुद से अलग करके भी

मुस्कुरा रही है—


यह त्याग नहीं,

यह

जीवन का सबसे गहरा प्रेम है।


अरे ओ बेटी की माँ!

तुम्हारी यह खामोशी भी

एक लोरी है—


आओ,

आज

रसोई की आँच थोड़ी धीमी करो—

और एक कप चाय में

अपनी यादें घोल दो…


शायद

तुम्हारी गोद

फिर से भर उठे

किसी अहसास से।


मुकेश ,,,,,

1 comment:

  1. beton ki maa ke saath bhi yahi hota hai. Purani copiyaan, bachpan ki chhoti gaadiyaan.. sab rakhi rehti hain ghar mein

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