“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
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Tuesday, 28 August 2012
नफ़स नफ़स तेरी जान को सम्हाले रखता हूँ
नफ़स नफ़स तेरी जान को सम्हाले रखता हूँ
मेरे बगैर तू कैसे ज़िन्दगी छोड़ेगी देखता हूँ ?
मौत को भी न मौत के घात उतार दूं जाने जाँ
कसम खुदा की त़ा ज़िन्दगी तेरे सामने न आऊँ
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