“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
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Tuesday, 28 August 2012
तीरगी ऐ ज़ीस्त में भी साफ़ दिखता है
तीरगी ऐ ज़ीस्त में भी साफ़ दिखता है
आप की आखों में खुदा का नूर दिखता है
मौसमे खिज्र के आलम में ये आम होता है
आप होते हो तो मौसम खुशनुमा होता है --
(ज़ीस्त -- ज़िन्दगी, खिज्र - वियोग )
मुकेश इलाहाबादी -------------------------
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