“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है
जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है
और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
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Tuesday, 11 September 2012
बेशक ! काँटों से तो बचा लिया आपने दामन अपना
बेशक ! काँटों से तो बचा लिया आपने दामन अपना
मगर इस कोशिश में कुछ गुल भी तो बिछड़ गए होंगे ?
मुकेश इलाहाबादी -------------------------------------------
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