धुएँ का एक घेरा और उसमें उसका नाम...
सिगरेट का आख़िरी कश था
या कोई प्राचीन मन्त्र,
जो होठों से निकला
और हवा में एक गोल घेरा बन गया।
धुएँ का एक घेरा
धीरे-धीरे फैलता हुआ
जैसे समय की कोई पुरानी स्मृति
जो लौट आई हो उसी रूप में,
उसी नमी में।
उस घेरे के बीच
अस्पष्ट लेकिन सजीव/उसका नाम उभरा
जैसे किसी ने आहिस्ता से
उसके नाम को जलाया हो
मेरे फेफड़ों की तपिश पर।
मैं ठहर गया...
वो घेरा ठहरा नहीं —
फिर भी उस लम्हे ने/समय को साँस लेना सिखा दिया।
कभी कभी लगता है,/मैं सिगरेट नहीं पीता —
उसका नाम जलाता हूँ
हर बार
और धुएँ में ढूँढता हूँ
वो पल,/जब उसने पहली बार कहा था
"एक बार मैं भी सिगरेट पीकर देखूँगी..."
अब धुएँ का हर घेरा
उसी एक नाम की/धुंधली परछाईं है
जो कभी लिपटी थी मुझसे
बिलकुल वैसे ही
जैसे अब सिगरेट की राख
मेरी उँगलियों से लिपटती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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