सन्नाटे की पगडंडी
सन्नाटे की पगडंडी पर
मैं अकेला चलता हूँ —
पाँव मिट्टी में धंसते हैं
जैसे बीते हुए कल की यादें
हर कदम के साथ गहरी होती जाएँ।
आसमान सुना है
और सितारे भी चुप हैं,
कोई तारा नहीं जल रहा
जो मुझे दिशा दिखाए,
सिर्फ़ मेरी साँसें
हवा में बिखरी हुई चीख़ हैं।
बीते हुए रिश्तों की खिड़कियाँ
अंदर की रोशनी बुझा चुकी हैं,
किसी ने दीवारों पर नोट्स छोड़े हैं
“हमेशा याद रखना” —
और मैं हर नोट पढ़कर
ख़ामोशी में मुस्कुराता हूँ।
समंदर की लहरें भी
अब मेरे कदमों से डरती हैं,
क्योंकि मैं उन पर नहीं चलता
मगर वे मुझे छूकर
अपने भीतर की तन्हाई दिखाती हैं।
कुछ लोग आते हैं,
कुछ आवाज़ों में घुल जाते हैं,
मगर मैं उनकी यादों में भी
अपना चेहरा खोजता हूँ।
क्योंकि अकेलेपन का असली स्वाद
सिर्फ़ उसी में है
जो खुद से भी डरता है।
रातें लंबी हैं
और चाँद मेरी आँखों में उतर आता है,
मैं उसके साथ नहीं,
उसके बिना जीता हूँ।
हर सांस में वही दर्द है
जो शब्दों में नहीं आता।
और मैं चलता रहता हूँ
सन्नाटे की पगडंडी पर,
जहाँ हर पत्थर
मेरी उम्मीद को रगड़ता है
और हर काँटा
मेरी यादों को झकझोरता है।
मगर मैं नहीं रुकता,
क्योंकि कभी-कभी
तन्हाई की गहराई में
मैं खुद को ढूँढ लेता हूँ
और यही मेरा घर है,
यही मेरा आसमान है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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