सुनहरा पृष्ठ
तुम
समय की पुरानी डायरी से
गिरा हुआ एक सुनहरा पृष्ठ हो
जिस पर स्याही नहीं,
साँसें लिखी हैं।
तुम्हारे किनारों पर
हल्की-सी झुर्रियाँ हैं,
जैसे सदियों ने
उँगलियों से छूकर
तुम्हें पढ़ा हो।
जब तुम्हें खोलता हूँ,
बीते मौसमों की खुशबू आती है—
बरसात की पहली बूँद,
धूप का फीका पड़ता आलिंगन,
और किसी प्रतीक्षा का लंबा विराम।
तुममें तारीख़ें नहीं,
क्षण दर्ज हैं
वे जो कहे नहीं गए,
पर जी लिए गए।
कभी-कभी
तुम्हारी सतह पर
एक हल्की-सी चमक उभरती है,
मानो अतीत
फिर से वर्तमान होना चाहता हो।
तुम सुनहरा पृष्ठ हो
जिसे समय ने
संभाल कर रखा,
फिर अचानक
मेरे जीवन की किताब में
सरका दिया।
और अब
मैं हर दिन
तुम्हें पढ़ता नहीं—
बस महसूस करता हूँ।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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