मैं राख था,
वो अपने होंठों से फूँक देती थी…
शायद ये प्रेम नहीं था,
बस एक आदत थी
जिसे मिटाने से ज़्यादा
जिन्दा रखना आसान होता है।
जब उसने ध्यान में मेरी देह पढ़ी
(एक प्रेम-ध्यान की अलौकिक अनुभूति)
जब उसने
ध्यान में मेरी देह पढ़नी शुरू की
तो वो किताब नहीं,
एक धधकती मंत्रमाला थी
हर रोम पर उकेरा कोई रहस्य,
हर श्वास में गूंजता एक प्राचीन श्लोक।
उसने न मेरी आँखें खोली,
न होठों को छुआ,
सिर्फ मौन में बैठकर
मेरी आत्मा का नक़्शा उतार लिया।
मैं स्तब्ध था
जैसे कोई ऋषिका
अपने ध्यान में
पुरुष के समस्त जन्मों को पढ़ रही हो।
वो देह से नहीं गुज़री,
वो देह के पार उतर गई।
और तब,
जो शांति मेरे भीतर सुलगती थी,
वो निर्वाण बन गई।
ओस में भीगे होंठों पर जला,
और फिर बुझ गया
अपनी ही राख में।
वो आई जैसे ध्यान की पहली साँझ—
धीरे से
मेरे धुएँ को अपनी पलकों में समेटती हुई।
मैं सुलगता रहा,
वो देखती रही
जैसे कोई प्राचीन कथा
किसी राख के अक्षर में दुबारा लिखी जा रही हो।
जहाँ पहले
केवल नशा था,
अब निर्वाण था।
जहाँ पहले
एक फूँक से ख़त्म हो जाने वाला
क्षणिक अस्तित्व था,
अब वहाँ वो थी
स्थिर, निश्चल,
जैसे किसी योगिनी की दृष्टि।
मैं बुझ चुका था,
मगर अबकी बार
किसी और तरह से।
कोई लौ नहीं बची,
कोई धुआँ नहीं
सिर्फ उसकी उपस्थिति।
और यही था शायद
एक सिगरेट का
मुक्ति-पथ।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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