उसने दूसरी बार प्रेम नहीं किया, वो पहली बार जीती थी…
उसने दूसरी बार प्रेम नहीं किया,
क्योंकि पहली बार
उसने अपने ही हाथों
कंगन पहनते हुए
आईने में देखा था
एक मुस्कान—जो किसी और की वजह से नहीं थी।
उसने दूसरी बार प्रेम नहीं किया,
क्योंकि पहली बार
वो अपने नाम के आगे
किसी और का नाम लगाना भूल गई थी,
और उसे इस भूल में
एक अजीब-सी मुक्ति मिली थी।
उसने दूसरी बार प्रेम नहीं किया,
क्योंकि पहली बार
वो बारिश में भीगी थी
अपने मन के संगीत पर,
किसी की बाँहों में नहीं
बल्कि खुले आसमान के नीचे
अपनी हथेलियों को खोलकर।
उसने दूसरी बार प्रेम नहीं किया,
क्योंकि पहली बार
उसने खुद को
एक पत्र लिखा था
बिना किसी उपसंहार के,
सिर्फ़ ‘तुम सबसे सुंदर हो’ कहकर।
वो अब प्रेम नहीं करती,
बल्कि जीती है
हर सुबह के सूरज में,
हर थकी हुई साँझ में,
हर उस लम्हे में
जब वो आईने में खुद को
पहचाना करती है
बिना किसी शिकवे,
बिना किसी प्रतीक्षा के।
उसने दूसरी बार प्रेम नहीं किया,
क्योंकि पहली बार
उसने जीना सीख लिया था।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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