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Tuesday, 24 February 2026

पहुँचना और होना — दो अलग कथाएँ

 पहुँचना और होना — दो अलग कथाएँ


पहुँचना

एक क्रिया है।

होना

एक अवस्था।


पहुँचना

समय में दर्ज होता है

तारीख़, वर्ष,

एक ध्वज,

एक घोषणा।


होना

मिट्टी में दर्ज होता है

बीज की तरह,

धीरे-धीरे,

बिना शोर के।


किसी ने कहा

“हम यहाँ पहुँचे।”

पर क्या पहुँचना

हो जाने के बराबर है?


तट पर कदम रख देना

उस रेत का हिस्सा हो जाना नहीं होता।


पहुँचना अक्सर

बाहर से आता है

नावों पर,

हवाई जहाज़ों में,

दस्तावेज़ों के साथ।


होना भीतर से उगता है

भाषा में,

रोटी की गंध में,

रिश्तों की जड़ों में।


पहुँचना

दूरी तय करता है।

होना

गहराई।


किसी देश में पहुँच जाना

उसके दुख-सुख में होना नहीं है।

किसी शहर में बस जाना

उसकी धड़कन में बस जाना नहीं है।


इतिहास

पहुँचने को दर्ज करता है;

स्मृति

होने को।


पहुँचना एक क्षण है—

होना एक निरंतरता।


कई लोग पहुँचे

उन्होंने नक्शे बनाए,

नाम बदले,

घोषणाएँ कीं।

पर जो पहले से थे,

वे बस थे

बिना उद्घोष के,

बिना प्रमाण के।


और शायद

सबसे कठिन यात्रा

किसी स्थान तक नहीं,

किसी स्थान में होना है।


पहुँचना कहता है

“मैं आ गया।”

होना कहता है—

“मैं यहीं से हूँ।”


दोनों कथाएँ अलग हैं

एक बाहर की,

एक भीतर की।


और दुनिया की सबसे गहरी सच्चाई

शायद यही है

कि पहुँचना आसान है,

होना कठिन।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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