भीष्म - प्रतिज्ञा और परिणाम
प्रथम सर्ग : गंगासुत का उदय ;-
गंगा की गोद में जन्मा तेजोमय बालक ।
नेत्रों में नील गगन, वाणी में दृढ़ता गहरी ।
शस्त्रों की रेखाओं में खेली उसकी तरुणाई ।
देवव्रत नाम, कुलदीपक उज्ज्वल ज्योतिर्मय ॥
पिता के चरणों पर अर्पित जीवन सारा ।
स्वार्थों से दूर खड़ा, संकल्पों का धारी ।
हस्तिनपुर-भवनों में चलता हुआ भवितव्य ।
छाया-सा साथ लिए अनकहा व्रत भीषण ॥
द्वितीय सर्ग : भीषण प्रतिज्ञा :-
सभा हुई स्तब्ध, दिशाएँ हुईं निःशब्द ।
राजा के नेत्रों में दग्ध अभिलाषा जागी ।
सत्यवती-शर्तें उठीं सिंहासन से ऊँची ।
क्षण भर को थमा हुआ समय स्वयं ठहरा ॥
“राज्य त्यजूँगा मैं”—वज्र-स्वर गूँजा ।
“ब्रह्मचर्य-व्रत भी जीवन भर धारण करूँगा ।
न होगी मेरी संतान सिंहासन-अधिकारिणी”
काँपी धरा, गगन से उच्चरित—“भीष्म” ॥
उस दिन हुआ अमर वह त्याग-व्रत-धारी ।
पर अंतर्मन में कुछ मौन हुआ, बुझ-सा ।
प्रतिज्ञा ने दी ऊँचाई आकाश-सी असीम ।
पर बीज परिणामों का चुपचाप बोया ॥
तृतीय सर्ग : व्रत का विस्तार :-
राजा बदले, बदली राजसभा की ध्वनियाँ ।
पर अचल खड़े थे वे वंश-ध्वज समान ।
द्यूत-सभा में जब धर्म हुआ अपमानित ।
मौन रहे भीष्म, व्रत-बंधन में बँधे ॥
देखा अन्याय, हृदय हुआ शूल-विद्ध ।
राजधर्म, कुलधर्म, प्रतिज्ञा—त्रिशूल बने ।
दीपक-सी काँपी भीतर की करुणा ।
पर लौह-व्रत ने रोका निर्णायक हस्त ॥
उस दिन समझा मन—धर्म सरल न होता ।
प्रतिज्ञा कभी बन जाती स्वयं कारागार ।
ऊँचाई का मूल्य गहराई में मिलता ।
मौन का बोझ हुआ प्राणों पर भारी ॥
चतुर्थ सर्ग : रण और विवशता :-
शंखनिनादों से काँपा कुरुक्षेत्र ।
ध्वजा उठाए खड़े वज्र-सम वृद्ध ।
सामने शिष्य, अर्जुन धन्वा ताने ।
स्मृतियों से भीगा कठोर हृदय ॥
दस दिवसों तक अजेय रहे रण में ।
धनुष-प्रहारों में अग्नि-सी ज्वाला ।
शिखंडी आया—अतीत खड़ा था ।
शस्त्र झुका, स्वीकृत हुई विधि ॥
बाणों की वर्षा से देह विदीर्ण ।
पर मुख पर धैर्य, दृष्टि अचल ।
गिरे नहीं भूमि पर—शरशय्या पर ठहरे ।
वीरता संग विवशता भी उजागर ॥
पंचम सर्ग : शरशय्या और बोध :-
बाणों की शय्या तपोभूमि बन गई ।
सूर्य-दक्षिणायन में मृत्यु प्रतीक्षारत ।
धर्म-प्रश्नों का उत्तर देते हुए शांत ।
स्वर हुआ निर्मल, जैसे गंगाजल ॥
“धर्म प्रवाही है, शिला नहीं स्थिर ।
व्रत महान, पर फल जटिल गूढ़ ।
ऊँचाई मिलती संकल्प से मानव को ।
पर परिणाम देते गहराई सच्ची ।”
उत्तरायण में जब सूर्य उदित हुआ ।
मुक्त श्वास लेकर त्यागा तन ।
इतिहास ने देखा—केवल योद्धा नहीं ।
एक जटिल, जाग्रत मनुष्य गया ॥
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment