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Wednesday, 25 February 2026

भीष्म - प्रतिज्ञा और परिणाम

 भीष्म - प्रतिज्ञा और परिणाम

प्रथम सर्ग : गंगासुत का उदय ;-

गंगा की गोद में जन्मा तेजोमय बालक ।

नेत्रों में नील गगन, वाणी में दृढ़ता गहरी ।

शस्त्रों की रेखाओं में खेली उसकी तरुणाई ।

देवव्रत नाम, कुलदीपक उज्ज्वल ज्योतिर्मय ॥


पिता के चरणों पर अर्पित जीवन सारा ।

स्वार्थों से दूर खड़ा, संकल्पों का धारी ।

हस्तिनपुर-भवनों में चलता हुआ भवितव्य ।

छाया-सा साथ लिए अनकहा व्रत भीषण ॥


द्वितीय सर्ग : भीषण प्रतिज्ञा :-


सभा हुई स्तब्ध, दिशाएँ हुईं निःशब्द ।

राजा के नेत्रों में दग्ध अभिलाषा जागी ।

सत्यवती-शर्तें उठीं सिंहासन से ऊँची ।

क्षण भर को थमा हुआ समय स्वयं ठहरा ॥


“राज्य त्यजूँगा मैं”—वज्र-स्वर गूँजा ।

“ब्रह्मचर्य-व्रत भी जीवन भर धारण करूँगा ।

न होगी मेरी संतान सिंहासन-अधिकारिणी”

काँपी धरा, गगन से उच्चरित—“भीष्म” ॥


उस दिन हुआ अमर वह त्याग-व्रत-धारी ।

पर अंतर्मन में कुछ मौन हुआ, बुझ-सा ।

प्रतिज्ञा ने दी ऊँचाई आकाश-सी असीम ।

पर बीज परिणामों का चुपचाप बोया ॥


तृतीय सर्ग : व्रत का विस्तार :-


राजा बदले, बदली राजसभा की ध्वनियाँ ।

पर अचल खड़े थे वे वंश-ध्वज समान ।

द्यूत-सभा में जब धर्म हुआ अपमानित ।

मौन रहे भीष्म, व्रत-बंधन में बँधे ॥


देखा अन्याय, हृदय हुआ शूल-विद्ध ।

राजधर्म, कुलधर्म, प्रतिज्ञा—त्रिशूल बने ।

दीपक-सी काँपी भीतर की करुणा ।

पर लौह-व्रत ने रोका निर्णायक हस्त ॥


उस दिन समझा मन—धर्म सरल न होता ।

प्रतिज्ञा कभी बन जाती स्वयं कारागार ।

ऊँचाई का मूल्य गहराई में मिलता ।

मौन का बोझ हुआ प्राणों पर भारी ॥


चतुर्थ सर्ग : रण और विवशता :-

शंखनिनादों से काँपा कुरुक्षेत्र ।

ध्वजा उठाए खड़े वज्र-सम वृद्ध ।

सामने शिष्य, अर्जुन धन्वा ताने ।

स्मृतियों से भीगा कठोर हृदय ॥


दस दिवसों तक अजेय रहे रण में ।

धनुष-प्रहारों में अग्नि-सी ज्वाला ।

शिखंडी आया—अतीत खड़ा था ।

शस्त्र झुका, स्वीकृत हुई विधि ॥


बाणों की वर्षा से देह विदीर्ण ।

पर मुख पर धैर्य, दृष्टि अचल ।

गिरे नहीं भूमि पर—शरशय्या पर ठहरे ।

वीरता संग विवशता भी उजागर ॥


पंचम सर्ग : शरशय्या और बोध :-

बाणों की शय्या तपोभूमि बन गई ।

सूर्य-दक्षिणायन में मृत्यु प्रतीक्षारत ।

धर्म-प्रश्नों का उत्तर देते हुए शांत ।

स्वर हुआ निर्मल, जैसे गंगाजल ॥


“धर्म प्रवाही है, शिला नहीं स्थिर ।

व्रत महान, पर फल जटिल गूढ़ ।

ऊँचाई मिलती संकल्प से मानव को ।

पर परिणाम देते गहराई सच्ची ।”


उत्तरायण में जब सूर्य उदित हुआ ।

मुक्त श्वास लेकर त्यागा तन ।

इतिहास ने देखा—केवल योद्धा नहीं ।

एक जटिल, जाग्रत मनुष्य गया ॥


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

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