और वो लड़की...
और वो लड़की
जो अपनी हँसी में अक्सर कुछ छुपा लेती थी,
कभी पलकों की कोरों पर टंगी रहती थी
किसी अधूरे ख्वाब की तरह,
तो कभी किसी पुराने मौसम की
धीमी परछाईं बन जाती थी।
वो अक्सर चाय को देर तक
ठंडा होने देती थी
शायद किसी की याद को
ज़रा और देर तक अपने पास रखने के लिए।
वो लड़की
अब आईने से कम बात करती है,
कभी अपने बालों को बाँधते हुए
खुद को समझाने लगती है
कि अब रोना वक़्त की बर्बादी है।
उसकी डायरी के पन्नों में
अब भी वो नाम लिखा नहीं गया,
मगर हर पन्ना उसके होने की गवाही देता है
हर वाक्य, हर विराम, हर ख़ामोशी।
कभी जब बारिश होती है,
तो वो खिड़की के पास नहीं जाती,
बस खुद को याद दिलाती है
कि अब भीगने से कुछ नहीं बदलता।
वो लड़की
अब किसी की मोहब्बत नहीं चाहती,
वो अब खुद को सँवारने लगी है
जैसे कोई मंदिर की मूर्ति
अपने ही भीतर से पूजा जाने लगी हो।
और मैं...
अब भी वही हूँ
जो उसकी चुप्पियों को पढ़ने की कोशिश करता है,
जो हर नज़्म में उसे छुपाकर लिखता है,
जैसे कोई राज
किसी मज़ार की माटी में दफ्न हो
और फिर भी हर ज़िंदा दिल में धड़कता हो।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,
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