मैं, ख्वाब और टूटे पन्ने
मैं बैठा हूँ पुराने अलमारी के पास,
जहाँ तेरे और मेरे ख्वाब
टूटे पन्नों में दबे हुए हैं।
हर पन्ना एक कहानी कहता है,
हर दरार एक अधूरी हँसी याद दिलाती है।
ख्वाब मेरे हाथों से फिसलते हैं,
जैसे बारिश की बूंदें
किसी सूखी मिट्टी में खो जाती हैं।
मैंने उन्हें सजाया था,
तेरे और मेरे कल के रंगों से,
लेकिन वक्त ने उन्हें तोड़ दिया,
और सिर्फ यादें रह गईं,
गम और मुस्कान के बीच उलझी हुई।
मैं, अपने अकेलेपन में बैठा,
उन टूटे पन्नों से बातें करता हूँ।
हर शब्द, हर चित्र,
मुझे तेरे पास ले जाता है,
लेकिन तुम वहाँ नहीं हो।
सिर्फ ख्वाब हैं,
और मैं,
जो उन्हें हर बार जिंदा करने की कोशिश करता हूँ।
लेकिन फिर भी,
मैं मुस्कुराता हूँ
क्योंकि टूटे पन्ने भी कहते हैं,
“हमने साथ बिताए पल संजोए हैं।”
और ख्वाब, चाहे अधूरे हों,
मुझे यह सिखाते हैं कि
प्यार सिर्फ हकीकत में नहीं,
यादों और उम्मीदों में भी जीता है।
मैं, ख्वाब और टूटे पन्ने
तीनों मिलकर मेरी तन्हाई में
एक रूहानी संगीत बना देते हैं,
जहाँ सिर्फ एहसास और प्यार बचे रहते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,
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