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Sunday, 22 February 2026

धुएँ में उड़ता मेरा ग़म और तुम"

 धुएँ में उड़ता मेरा ग़म और तुम"


एक दिन

जब वो अचानक रुक गई

मेरे सामने बैठ कर

धीरे से पूछा 

"कौन सा ग़म है

जो हर रोज़

धुएँ में उड़ा देते हो?"

मैंने उसकी आँखों में देखा

जहाँ सवाल नहीं,

एक टूटी हुई शिकायत थी 

जैसे कोई उम्मीद

बहुत देर से खड़ी हो इंतज़ार कर रही हो।

मैं चुप रहा 

जैसे सिगरेट का वो कश

जो लिया तो सही

मगर छोड़ा नहीं गया।

"क्या मैं,

मेरा साथ,

तुम्हारे उस दर्द से छोटा हूँ

जो हर दिन

तुम इस राख में बदलते हो?"

उसके होंठ काँपे

पर आवाज़ नहीं टूटी 

बस आँखें कह गईं

जो लफ़्ज़ नहीं कह पाए।

मैंने चाहा कह दूँ 

कि ग़म वो नहीं

जो तुम समझती हो,

वो अधूरी बातें हैं,

वो अधूरे ख्वाब,

वो रातें जो मैंने तुम्हारे बिना

जीनी शुरू कर दी थीं

तुम्हारे साथ होते हुए।

पर मैं कह नहीं पाया 

बस धुआँ उड़ाया

जैसे हमेशा उड़ाता हूँ।

वो उठी 

धीरे, बिल्कुल उस राख की तरह

जो सिगरेट से गिरती है

बिना शोर।

और उस दिन

धुआँ कुछ और भारी था 

जैसे उसमें अब

ग़म के साथ उसका सवाल भी उड़ रहा था।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

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