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Wednesday, 25 February 2026

मुझे मालूम है…

 मुझे मालूम है…


मुझे मालूम है

तुम मोबाइल में क्या–क्या देखती हो

और क्या स्क्रॉल करके

आगे बढ़ जाती हो।


तुम हर तस्वीर पर नहीं ठहरती—

बस उन चेहरों पर

जहाँ कभी तुम्हारा नाम

हल्के से चमका था।


तुम हर शेर को नहीं पढ़ती—

सिर्फ़ वो अल्फ़ाज़

जो तुम्हारी रातों की तरह

थोड़े अधूरे,

थोड़े बेचैन होते हैं।


मुझे मालूम है

तुम किस पोस्ट पर मुस्कुरा देती हो

और किसे बिना प्रतिक्रिया

चुपचाप गुज़र जाने देती हो—

जैसे कुछ लोग ज़िन्दगी में

आए भी थे

और तुमने जताया भी नहीं।


तुम “online” सबको देखती हो

पर खुद को “available” नहीं करती,

तुम्हारी उँगलियाँ

कई बार किसी नाम तक जाती हैं

फिर लौट आती हैं—

जैसे दरवाज़े तक पहुँच कर

इज़्ज़त से वापस मुड़ जाना।


तुम स्टेटस पढ़ती हो—

खुशियों के, यात्राओं के,

नई मोहब्बतों के—

और तुम्हारे भीतर

एक पुरानी शाम

हल्का-सा करवट लेती है।


तुम जानती हो

हर चमकती तस्वीर

रोशनी नहीं होती,

कुछ बस फ़िल्टर होते हैं—

और तुम फ़िल्टरों से

सच पहचानना सीख चुकी हो।


मुझे ये भी मालूम है

तुम देर रात

पुरानी चैट ऊपर तक स्क्रॉल करती हो—

जहाँ “ख़याल रखना”

अब भी पड़ा है

बिना किसी जवाब के।


फिर तुम स्क्रीन लॉक कर देती हो,

जैसे दिल पर ताला लगा हो—

आवाज़ें आती रहें,

पर अंदर कोई हलचल न हो।


मगर सुनो,

तुम सिर्फ़ देखने वाली नहीं हो—

तुम्हारे भीतर भी

एक पूरी कहानी है

जिसे तुम अभी

पोस्ट नहीं करती।


और एक दिन

जब तुम स्क्रॉल करना छोड़ कर

अपने हिस्से की रोशनी चुनोगी,

तो मोबाइल की स्क्रीन नहीं,

तुम्हारी आँखें चमकेंगी—

बिना किसी नोटिफ़िकेशन के।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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